जाट आरक्षण के फैसले को लेकर केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। गत मार्च में दिए फैसले को सुप्रीम कोर्ट में फेरबदल करने का इनकार किया है।
न्यायमूर्ति रंजन गोगई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार की याचिका खारिज करते हुए कहा कि पूर्व फैसले में दखल देने का कोई कारण नहीं बनता।
मालूम हो कि गत 17 मार्च को शीर्ष अदालत ने नौ राज्यों के जाट समुदायों को अन्य पिछड़ा वर्ग की केंद्रीय सूची में डालने केकेंद्र सरकार केफैसले को दरकिनार कर दिया था।
यूपीए सरकार ने जारी की थी अधिसूचना
पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा गत वर्ष आम चुनाव से ठीक पहले इस संबंध में
अधिसूचना जारी की थी, जिसे अदालत ने निरस्त कर दिया था। अदालत ने अपने
फैसले में साफ कर दिया था कि अब जाटों को न तो केंद्र सरकार की नौकरियों
में और न ही किसी शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण का लाभ मिलेगा।
सुप्रीम
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि किसी समूह को पिछड़ा वर्ग का दर्जा देने
में सामाजिक पिछड़ेपन की सबसे अहम भूमिका होती है लेकिन इसके लिए जाति को
सिर्फ आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।पिछड़ेपन के नए और उभरते स्वरूप केप्रति
राज्य को चौकन्ना और सतर्क रहने की जरूरत है।
पिछले आम चुनाव से ठीक
पहले यूपीए सरकार ने मार्च 2014 में अधिसूचना जारी कर उत्तर प्रदेश,
हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश और
राजस्थान के दो जिले भरतपुर और धौलपुर के जाटों को ओबीसी की सूची में
शामिल करने का फैसला लिया था।
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के सिफारिशों को किया नजरअंदाज
यानी जाटों को आरक्षण का लाभ देने का निर्णय
लिया गया था। इसके लिए यूपीए सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग
के सिफारिशों को नजरअंदाज कर दिया था। आयोग ने जाट को ओबीसी की श्रेणी में
डालने की बात कही थी।
आयोग ने बाकायदा इसके लिए विस्तृत कारण भी बताए थे।
बावजूद इसके केंद्र सरकार ने जाट को ओबीसी की सूची में डालने को सही
ठहराया था।
इसके बाद एनडीए सरकार का भी कहना था कि यह जनहित में लिया गया
निर्णय है। साथ ही सरकार का कहना था कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की
सलाह को मानना सरकार केलिए जरूरी नहीं है।
फैसले केदिन से ही प्रभावी होगी व्यवस्था: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जाट आरक्षण पर जिस दिन फैसला दिया गया, उसी दिन से वह प्रभावी हो गया। इसकेसाथ ही शीर्ष अदालत ने उन छात्रों को राहत देने से इनकार किया है जिनका चयन स्टेट बैंक ऑफ इंडिया पीओ परीक्षा में हो चुका है, लेकिन नियुक्ति पत्र नहीं मिला है।
न्यायमूर्ति रंजन गोगई और न्यायमूर्ति रोहिंगन नरीमन ने छात्रों द्वारा याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि जिन लोगों को 17 मार्च 2015 तक नियुक्ति पत्र नहीं मिला है, उन पर शीर्ष अदालत का फैसला प्रभावी होगा।
इससे पहले छात्रों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि तमाम छात्रों का एसबीआई में चयन हो चुका था। सभी प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी थीं लेकिन उन्हें नियुक्ति पत्र नहीं मिला।
अदालत ने दलील मानने से किया इंकार
शीर्ष अदालत केफैसले केबाद अथॉरिटी ने इन छात्रों को नियुक्ति पत्र देने से
इनकार किया। उन्होंने बताया कि एक छात्र की ट्रैनिंग भी शुरू हो गई थी,
लेकिन उसे ट्रैनिंग से लौटा दिया गया
वरिष्ठ वकील ने बताया कि कुछ लोग को इस नौकरी केचक्कर में दूसरी नौकरी भी छोड़ चुके हैं, ऐसे में इन छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ गया है।
उन्होंने कहा कि अदालत चाहे तो इन छात्रों के हक में फैसला दे सकती है। लेकिन अदालत ने इंदिरा जयसिंह की दलीलों को मानने से इनकार कर दिया।