रसोई गैस के सिलेंडरों की संख्या पर कैप लग जाने से अब जंगलों की शामत आने की आशंका बढ़ गई है क्योंकि देशभर में आज भी ईंधन के तौर पर सालाना 21.64 करोड़ टन लकड़ी चूल्हों में स्वाहा हो जाती है। पर्यावरणविदों का मानना है कि सस्ती रसोई गैस की उपलब्धता कम हो जाने से लोग खासतौर पर ग्रामीण अपने परंपरागत ईंधन यानी लकड़ी और कोयले की ओर बढ़ सकते हैं।
इससे जंगलों के कटने की आशंका बढ़ेगी और पर्यावरण में धुआं भी बढ़ेगा। नतीजतन, पहले से ही ग्रीन हाउस गैसों के कहर से जूझ रहा पर्यावरण और भी खराब हो जाएगा। इसका सबसे बुरा असर हिमालय पर भी पड़ सकता है। भारतीय वन रिपोर्ट-2011 के अनुसार देश में ईंधन के तौर पर सालाना 21.64 करोड़ टन लकड़ी का इस्तेमाल होता है।
इनमें हिमालयी क्षेत्रों से लेकर आदिवासी व ग्रामीण इलाकों में इस्तेमाल होने वाली लकड़ी भी शामिल कर दी जाए तो यह आंकड़ा और भी ज्यादा हो सकता है। केंद्रीय वन व पर्यावरण मंत्रालय भी मानता है कि गांवों के आसपास जंगलों में गिरी लकड़ी इन आंकड़ों में शामिल नहीं है। केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकी रिपोर्ट-2012 के अनुसार देश में ईंधन की लकड़ी के उत्पादन की कीमत 56,452 करोड़ रुपये रही है।
पर्यावरणविद डा. अनिल जोशी मानते हैं कि सब्सिडी वाले घरेलू गैस सिलेंडरों की संख्या पर कैप लग जाने से लकड़ी की मांग बढ़ेगी। वे चिपको आंदोलन से जुड़े रहे मशहूर पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा का हवाला देकर कहते हैं कि बहुगुणा कहते रहे हैं कि जंगल बढ़ाने से खुद ही समुचित मात्रा में ईंधन के लिए लकड़ी उपलब्ध हो जाएगी।
बहरहाल, भारतीय वन रिपोर्ट पहले ही कह चुकी है कि देश में वन क्षेत्र लगातार घट रहा है, पिछले दो वर्षों के दौरान देश के वन क्षेत्र में 367 वर्ग किमी की कमी हुई है। वन क्षेत्र में कमी की एक वजह माओवादियों की ओर से जंगलों की अवैध कटाई भी शामिल है।
अकेले आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले में माओवादियों के इस गोरखधंधे से 182 वर्ग किमी जंगल कम हो गया। हालांकि सरकार ने ग्रीन इंडिया मिशन के तहत देश के वन क्षेत्र को 33 फीसदी तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन अब गांवों में लोगों के ईंधन के लिए दोबारा जंगलों पर निर्भर रहने का खतरा बढ़ गया है।