कुछ हफ्ते पहले एक तस्वीर में ड्रेस का रंग, एक बड़ा मसला बनकर इंटरनेट पर चर्चित रहा। कहीं भी उस ड्रेस के रंग को लेकर मत एक जैसा नहीं था।
दफ्तरों में, घरों में जैसे दो ख़ेमे बन गए - एक, जिन्हें ड्रेस गोल्ड-व्हाइट दिखी और दूसरे, जिन्हें ड्रेस ब्लू-ब्लैक दिखी। तो फिर असलियत क्या है? वही तस्वीर, दो इंसानों को नंगी आंख से अलग-अलग रंग की कैसे दिख सकती है?
दिमाग पर है सब निर्भर
दरअसल दिलचस्प बात ये जानने में है कि किसी वस्तु के रंग को लेकर हमारे दिमाग में क्या चलता है। क्या आप जानते हैं इसका विज्ञान क्या है? कल्पना कीजिए, मैं अपने एक दोस्त के हाथों में हाथ डाले सूर्यास्त देख रहा हूं। सूर्यास्त के समय आकाश सुनहरे रंग का दिखता है, वहीं दूसरी तरफ से नीले रंग का आकाश उससे मिलता हुआ प्रतीत होता है। मैं कहता हूं, "क्या ख़ूबसूरत रंग हैं।" और दूसरा दोस्त भी सहमत है।
उसके बाद थोड़ी देर की चुप्पी के बाद मैं कहता हूं कि आकाश का रंग नीला है। दोस्त सहमत है। लेकिन सवाल ये है कि क्या वो शख्स भी उसी नीले रंग को देख पा रहा है जो मैं देख रहा हूं।
यहां पर अंतर संभव है। हो सकता है जो नीला रंग मुझे नजर आ रहा हो, दूसरे को वैसा ही नीला रंग नहीं नजर आ रहा हो। ये भी संभव है कि मुझे सुनहरा नीला आकाश नजर आ रहा हो और दूसरे साथी को गहरा नीला रंग दिख रहा हो।
मेरी चिंता की वजह दर्शनशास्त्र का दायरा है, तंत्रिका विज्ञान नहीं।