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विदेशी पत्रिका ने पूछा, क्या कोई है जो मोदी को रोक सके?

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सारी दुनिया की निगाहें भारत के आम चुनाव पर लगी हुई हैं। भारत में इस समय समस्याओं की भरमार है। दस साल के कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने देश की हर मोर्चे पर हालत बिगाड़ कर रख दी है।
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विकास दर पांच फीसदी पर आ गई है, लाखों लोगों के सामने रोजगार की समस्या है। आर्थिक सुधारों का रास्ता बंद है, बिजली, खराब सड़कें बड़ी समस्या हैं। कांग्रेस शासनकाल में भ्रष्टाचार खूब फला-फूला है। नेताओं और अधिकारियों ने चार से 12 बिलियन डालर की रिश्वत ली है।

यही वजह है कि भाजपा नेता नरेंद्र मोदी अगले प्रधानमंत्री के लिए सबसे माकूल शख्स नजर आते हैं। उनका मुकाबला गांधी परिवार के राहुल गांधी से है।

मोदी पर दंगों को हवा देने का आरोप

जहां मोदी ने अपनी योग्यता से यह मुकाम हासिल किया है वहीं राहुल जैसे इसे अपना अधिकार मानकर चल रहे हैं। मोदी पहले चाय बेचते थे जबकि राहुल तो शायद ये भी नहीं जानते कि वे चाहते क्या हैं?

गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी का कार्यकाल शानदार रहा है। जहां यूपीए भ्रष्टाचार में डूबा है वहीं मोदी की छवि बेदाग है। यानी मोदी हर तरह से बेहतर हैं, फिर भी यह अखबार पीएम के लिए उनका समर्थन नहीं करता।

इसकी वजह 2002 के गुजरात दंगे हैं। मोदी ने विवाह नहीं किया है और वे कट्टरपंथी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़े रहे हैं। उन पर मुख्यमंत्री रहते हुए दंगों को हवा देने का आरोप है।

मोदी ने कभी दंगों पर नहीं दिया जवाब

बहरहाल मोदी के समर्थक दो बातें उनके बारे में कहते हैं, पहली तो उन पर कोई आरोप साबित नहीं गुआ है दूसरी यह कि वे बदल गए हैं। पहले पहली बात पर आते हैं, जहां तक आरोप साबित नहीं होने की बात है तो जानबूझकर दंगों के सुबूत नष्ट कर दिए गए।

दूसरा मोदी ने दंगों को लेकर अपना रुख कभी स्पष्ट नहीं किया। वे चाहते तो माफी मांग सकते थे लेकिन पिछले साल उन्होंने बस इतना कहा कि कोई पिल्ला कार के नीचे आ जाए दुख तो तब भी होता है।

विवाद होने पर उन्होंने कहा कि हिंदू तो होते ही नरम दिल हैं। मोदी ने कभी मुसलमानों की गोल टोपी नहीं पहनी और मुजफ्फरनगर दंगों की आलोचना भी नहीं की। जबकि ज्यादातर पीड़ित मुसलिम थे।
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दूर होने के बजाय बढ़ी मुस्लिमों की आशंका

दरअसल मुसलिम समाज की आशंकाओं को दूर न करके मोदी उन्हें बढ़ा रहे हैं। वे मुसलिम विरोधी वोटों को पाना चाहते हैं। अगर मोदी के पीएम रहते दंगे होते हैं या पाकिस्तान से विवाद होता है तो उनका रुख क्या होगा?

अगर मोदी दंगों में अपनी भूमिका पर खेद जताते तो अखबार उनका साथ देता। बंटवारे वाली राजनीति करने वाले शख्स को भारत जैसे संवेदनशील मुल्क का पीएम नहीं बनना चाहिए। हमें राहुल गांधी की कांग्रेस भी दमदार नहीं लगती लेकिन हम उसे मोदी जैसा परेशनी वाला विकल्प नहीं मानते।

अगर कांग्रेस जीतती है तो उसे अपने और देश में बदलाव करना होगा। अगर भाजपा जीतती है को गठबंधन सहयोगियों को मोदी को नहीं चुनना चाहिए। अगर वे फिर भी पीएम बन जाते हैं तो हमें बेहद खुशी होगी कि वे हमें गलत साबित करें और देश को अच्छी दिशा दें। लेकिन अभी तो हम उनका आकलन उनके अतीत से ही करेंगे। भारत को उनसे बेहतर की जरूरत है।
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