जलवायु परिवर्तन से जुडे़ खतरों की पड़ताल के लिए कई साल पहले इंटर गवर्नमेंट पैनल (आईपीसीसी) का गठन किया गया था। 2007 में आईपीसीसी ने जब जलवायु परिवर्तन से जुड़ी रिपोर्ट पेश की तो लोग हैरत में पड़ गए।
तभी यह बात साफ हो गई थी कि नीति निर्धारकों के लिए लंबे समय तक जलवायु परिवर्तन के खतरे को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
उसी साल जर्मनी में हुए जी-8 सम्मेलन में भी जलवायु परिवर्तन और मानव जाति के अस्तित्व का मुद्दा चर्चा में छाया रहा था।
आईपीसीसी की उस रिपोर्ट से दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन से जुडे़ खतरों के प्रति एक संदेश जरूर पहुंचा।
'शहरों के विकास मॉडल को पहाड़ों पर मत ले जाइए'
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव वैश्विक मौसम, ग्लेशियरों और पर्वतों पर तो दिख ही रहा है। लेकिन इसका सबसे खतरनाक पहलू मानव स्वास्थ्य है।
जलवायु परिवर्तन के कारण संक्रामक रोगों में बढ़ोतरी हो रही है। संक्रमण के फैलने की रफ्तार और उसका असर पहले से ज्यादा बढ़ा है।
‘ध्रुवीय भूमि पर बर्फ की चादर के आंशिक रूप से पिघलने से समुद्र जल का स्तर कई मीटर बढ़ सकता है, नदी के डेल्टाओं और निचले क्षेत्रों पर सबसे बुरे प्रभावों के साथ समुद्री तटों में बड़े बदलाव, निचले क्षेत्रों में बाढ़ आ सकती हैं।’
जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ते समुद्र जल के स्तर से तटीय क्षेत्रों के पास स्थित कोलकाता, शंघाई और ढाका जैसे शहरों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो रहा है।
‘वैज्ञानिक कारक साफ तौर पर नजर आ रहे हैं। हम अपनी आंखें बंद कर सकते। लेकिन वास्तविकता को दरकिनार नहीं किया जा सकता।’
आईपीसीसी की रिपोर्ट ने एक बार दुनिया को जरूर चेताया था। कोई रिपोर्ट एक बार हलचल जरूर पैदा कर सकती है।
लेकिन इसका स्थायी असर नहीं हो सकता क्योंकि लोग बहुत जल्दी भूल जाते हैं और फिर वही सिलसिला शुरू हो जाता है। इसलिए हमें ऐसे उपायों के बारे में सोचना होगा, जिससे लोगों को जलवायु परिवर्तन के बारे में निरंतर संदेश मिलता रहे।
ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में प्रकृति के साथ हुई छेड़छाड़ और उससे जुडे़ खतरों की चर्चा पहले नहीं हुई थी। लेकिन उन चर्चाओं और सुझावों पर अमल नहीं किया जाता।
हमें यह समझना होगा कि शहरों के विकास मॉडल को पहाड़ों पर जस का तस लागू नहीं किया जा सकता। पहाड़ों की अलग प्रकृति और जरूरते हैं। इसलिए वहां विकास का मॉडल की स्थानीय जरूरतों के मुताबिक ही होना चाहिए।
आपदाओं का कारण सिर्फ जलवायु परिवर्तन न होकर अंधाधुंध विकास और जरूरत से ज्यादा मानवीय दबाव भी है। नदियों के किनारे बड़े-बड़े होटल, मकान और टूरिस्ट कॉम्पलेक्स तैयार किए गए हैं।
नदियों के पानी में सिल्ट (गाद) बहकर आती है। जंगलों के कटने के कारण सिल्ट की समस्या बढ़ गई है। लिहाजा जब बाढ़ आती है तो नदी के किनारे पानी को संभाल नहीं पाते और सब कुछ बह जाता है।
ज्यादातर सड़कें नदियों के ठीक ऊपर बनाई गई हैं। जब भी सड़कों का रखरखाव के दौरान निकला मलबा सीधे नदियों में पहुंचता है। यह स्थिति लंबे समय में खतरनाक साबित होती है।
अगर निर्माण के नियमों, दूरगामी नतीजों और जनता के हितों पर समय रहते ध्यान दिया जाता तो इतना विनाश नहीं होता। हमें इन घटनाओं से भविष्य के लिए सबक सीखना चाहिए।
प्रकृति से छेड़छाड़ और जलवायु परिवर्तन की स्थिति में लोग और संपत्ति दोनों ही प्रभावित होंगे।’ दुनिया भर की सरकारों को जल्द से जल्द जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के उपाय करने होंगे।
विकास का मकसद लोगों के जीवन स्तर को सुधारना और उसे सुरक्षित बनाना होना चाहिए। विकास का खाका ऐसे खींचा जाए जिससे नुकसान कम हो और भविष्य भी सुरक्षित रहे। लेकिन मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना यह संभव नहीं है।