राष्ट्रवाद और देशभक्ति दो ऐसे शब्द हैं जो हमेशा ही विवाद के विषय रहे हैं। बात पाकिस्तान की हो तो यह खतरा और भी बढ़ जाता है। असल में इसका कारण कुछ ऐसे झूठ हैं जो इतिहास के नाम पर पाकिस्तानी बच्चों को पढ़ाए जा रहे हैं।
विज्ञापन
पाकिस्तान के प्रतिष्ठित अखबार डॉन में छपी एक रिपोर्ट में ऐसे ही ऐतिहासिक झूठों का पर्दाफाश किया गया है। क्या पाकिस्तान में इतिहास की पुस्तकों में जो तथ्य पढ़ाए जा रहे हैं वो निरपेक्ष और सही हैं? जब ये सवाल इतिहास के जानकारों से किया गया तो कुछ चौंका देने वाले खुलासे हुए।
आगे पढ़िए पाकिस्तान में इतिहास के नाम पर पढ़ाए जा रहे झूठ की पूरी कहानी...
पढ़ाया जाने वाला सबसे बड़ा झूठ
पाकिस्तान में इतिहास की किताबों में एक बड़ा झूठ पढ़ाया जा रहा है। छात्रों को पढ़ाया जा रहा है कि हिंदू-मुसलमान के मूल मान्यताओं में बड़ा विरोध है जिसकी वजह से भारत-पाक का बंटवारा हुआ। जबकि इस तरह के कोई साक्ष्य इतिहास में नहीं पाए जाते।
असल में दक्षिण भारत में रहने वाले मुसलमानों में ऐसी बहुत सी बातें कॉमन हैं जो इस इलाके के हिंदुओं में भी देखी जा सकती है। जबकि भारत के अन्य भाग में रहने वाले मुसलमानों से उनकी समानता नहीं की जा सकती।
भारतीय इतिहास को हिंदू और मुस्लिम दौर में बांटने की परंपरा की शुरूआत अंग्रेजों ने की। जबकि इस ऐतिहासिक सच से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए कई मुस्लिम शासकों ने आपस में ही कई लड़ाइयां लड़ी थीं। बाबर-इब्राहीम लोदी और मुगलों और दिल्ली सल्तनत के शासकों के बीच हुई लड़ाई के बारे में कौन नहीं जानता।
मुस्लिम शासकों द्वारा हिंदू मंदिरों को तोड़े जाने की घटना पर रिचर्ड एटन की किताब में खुलासा करते हुए कहा गया है कि ऐसा करने का मकसद राजनीतिक और आर्थिक था। इसके पीछे किसी तरह की धार्मिक मंशा नहीं थी। उन्होंने इस बात का भी खुलासा किया है कि ज्यादातर मुस्लिम शासकों ने हिंदू मंदिरों की रक्षा ही की।
ऐसे में पाकिस्तान की इतिहास की किताबों में ये पढ़ाया जाना कि भारत-पाक बंटवारे का कारण दो समुदायों के बीच संघर्ष था बिल्कुल ही गलत साबित होती है।
ये तथ्य अनुशय मलिक ने पेश किया जो लंदन विश्वविद्यालय से पीएचडी हैं और लाहौर युनिवर्सिटी में सहायक प्रोफेसर हैं।
झूठी प्रशंसा के लिए इतिहास से खिलवाड़
इतिहास लिखने में की गई सबसे बड़ी गलतियों में से एक है सत्ता वर्ग को खुश करने के लिए ऐतिहासिक तथ्यों के साथ हुई छेड़-छाड़। ये काम पाकिस्तान में बसस्तूर जारी रहा चाहे वहां सैनिक शासन हो या सिविल।
इस तरह की गलती उन स्थानीय स्कूल बोर्ड के द्वारा की गई जो बच्चों के लिए सेलेबेस निर्माण करने का काम करते हैं। हालांकि बच्चों के टेक्स्ट बुक में इस तरह का खिलवाड़ दोनों की देशों में किया गया है।
इस गलती को सुधारने के लिए पाकिस्तान के पहले शिक्षा मंत्री ने 1948 में ही प्रयास किया। उन्होंने कोशिश की इतिहास को प्रामाणिक तथ्यों के आधार पर लिखा जाए लेकिन उनके इस प्रयास को आगे नही बढ़ाया गया।
2004 में प्राइवेट पब्लिशर्स के आने के बाद भी इस प्रक्रिया को जारी रखा गया।
इशमत रियाज, एजुकेशन कंसलटेंट
बड़ी सच्चाई के साथ खिलवाड़
पाकिस्तान में इतिहास की किताबों में पढ़ाया जाने वाला एक बड़ा झूठ ये है कि इसके इतिहास की शुरूआत 711 एडी से होती है जब मुहम्मद कासिम ने सिंध पर आक्रमण्ा कर उस पर कब्जा किया।
जबकि इन किताबों में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सच्चाई को पूरी तरह से अनदेखा किया जाता है। वहां के इतिहास में इस दौर की उपलब्धियों के बारे में नहीं पढ़ाया जाता।
इस दौर में घटी महत्वपूर्ण घटनाएं जैसे कि आर्यों का उदय, महाभारत काल और बौद्घ धर्म के उदय की पूरी तरह से अनदेखी की जाती है।
पाकिस्तान में किसी बच्चे को यह पता नहीं है कि अशोक जिसकी राजधानी पाटलीपुत्र थी वह भी सिंध, खैबर और पंजाब का ही हिस्सा था।
हामिद खुहरों, सिंध के पूर्व शिक्षा मंत्री
भारत में भी बदला गया इतिहास
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मुसीरूल हसन का कहना है कि दोनों ही देशों में सत्ताधीश अपने फायदे के लिए इतिहास के साथ छेड़-छाड़ करते रहे हैं।
फिलहाल आरएसएस पृष्ठभूमि के व्यक्ति को इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च का चेयरमैन बनाया जाना भी इस तथ्य को पुख्ता करता है।
दोनों ही देशों में कबीर, नानक, अकबर और दारा सिकोह के विचारों को बच्चों तक पहुंचाने की जगह कुफ्र-ओ-इमाम की जंग जैसी बातों पर ज्यादा जोर दिया जाता है।
सआदत हसन मंटो ने विभाजन के दर्द को बयां करते हुए बताया कि दोनों हिस्सों में रहने वाले लोग एक सी सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को साझा करते हैं। फिर भी उन्हें अनेदेखा किया जाता है।
भारत के साथ युद्घों का झूठ
पाकिस्तानी बच्चों को पढ़ाए जा रहे इतिहास की एक किताब में उन्हें पढ़ाया जाता है कि 1965 के युद्घ में पाकिस्तान ने भारत के कई हिस्सों पर कब्जा कर लिया था। तभी भारत मदद के लिए युनाइटेड नेशन चला गया। बाद में पाकिस्तान ने जीते हुए सारे हिस्से भारत को वापस कर दिए।
इतिहास इसलिए पढ़ाया जाता है कि हम पूर्व में की गई गलतियों को दोबारा न करें। लेकिन पाकिस्तान में बच्चों को इस तरह से गलत इतिहास पढ़ाकर उन्हें एक ही गलती को दोहराने की सजा दी जा रही है।
बांग्लादेश विभाजन पर
पंजाब टेक्स्ट बुक बोर्ड की किताबों में पढ़ाया जा रहा है कि पूर्वी पाकिस्तान में बड़ी संख्या में हिंदू थे। उन्होंने कभी भी पाकिस्तान को नहीं अपनाया। उनमें से ज्यादातर टीचर्स थे जो बच्चों को भड़काने का काम करते थे।
यहां तक कि पूर्वी पाकिस्तान के हिंदू अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा भारत भेजते थे। बावजूद इसके विभाजन के समय पाकिस्तान ने यहां से जाने वाले गैर-मुस्लिमों को मदद दी, जबकि भारत से आने वाले मुस्लिमों पर भयानक अत्याचार किए गए।
इतिहास पर कई किताबें लिख चुकी रूबिना सइगोल का कहना है कि 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना का मकसद अंग्रेजों के प्रति अपनी वफादारी को साबित करना और मुस्लिमों और अंग्रेज शासकों के बीच समझ को बढ़ाना था।
1937 में इलेक्शन में मुस्लिम लीग को करारी हार मिली। इसके बाद से ही उसने मुस्लिम राष्ट्रवाद को बढ़ावा देना शुरू किया। असल में अपनी पहचान को बचाए रखने के लिए ही मुस्लिम लीग ने ऐसा कदम उठाया था।
बाद में इतिहास के माध्यम से उसने यह प्रचारित करने की कोशिश की कि पाकिस्तान की स्थापना केवल मुस्लिमों के लिए की गई है।