बिहार विधानसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की हालत बिना पतवार की नौका वाली होती दिख रही है। दरअसल मांझी की भूमिका को लेकर खुद भाजपा उलझ कर रह गई है। जदयू और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर ताबड़तोड़ हमला कर और भाजपा विरोधी मोर्चा में शामिल होने के लिए सीएम पद का उम्मीदवार बनाने की शर्त रखे जाने के बावजूद भाजपा की ओर से अभी तक मांझी के सामने कोई प्रस्ताव नहीं रखा गया है।
भले ही मुख्यमंत्री पद पर मची खींचतान के दौरान भाजपा ने मांझी को प्रताड़ित दलित और सियासी हीरो के रूप में पेश किया हो, मगर विधानसभा चुनाव में पार्टी उन्हें ज्यादा तवज्जो देने के मूड में नहीं है। पार्टी का आकलन है कि मांझी के बागी तेवर से भले ही नीतीश की छवि महादलितों में खलनायक की बनी हो, मगर खुद मांझी का प्रभाव महादलितों में अपनी जाति मुसहर तक ही सीमित है।
पद पर रहते अगड़ी जातियों के खिलाफ दिए गए अनर्गल बयान के कारण मांझी को भाजपा में शामिल करने पर भी ऊहापोह है। साथ ही पार्टी नेतृत्व को चुनाव पूर्व गठजोड़ की पेशकश रखे जाने पर मांझी की ओर से ज्यादा सीटों की मांग का भी डर सता रहा है।
नेतृत्व को इस बात का भी डर है कि मांझी से चुनाव पूर्व गठजोड़ की स्थिति में लोजपा और रालोसपा भी ज्यादा सीटें हासिल करने के लिए मोलभाव करेंगी। यही कारण है कि भाजपा चुप्पी साधे बैठी है। पार्टी की रणनीति है कि राजद-जदयू की स्थिति स्पष्ट हो जाने और गठजोड़ के बाद मांझी के लिए इन दलों का दरवाजा बंद होने के बाद ही वह कोई प्रस्ताव तैयार करे।