48 लोकसभा सीटों वाला महाराष्ट्र देश का दूसरा सबसे बड़ा सियासी सूबा है। और यही वजह है कि इस राज्य पर सभी राजनीतिक पार्टियों की निगाहें हैं। कई क्षेत्रीय पार्टियां चुनावी मैदान में हैं लेकिन मुख्य मुकाबला भाजपा-शिवसेना गठबंधन और एनसीपी-कांग्रेस गठजोड़ के बीच है।
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चुनावों के ठीक पहले बिछी राजनीति की बिसात पर अभी तक भाजपा और शिवसेना गठबंधन का पलड़ा भारी नजर आ रहा है। राज्य की 48 सीटों में से कम से कम 28 सीटों पर इस गठबंधन के पक्ष में माहौल दिख रहा है।
इसकी बड़ी वजह भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी भी हैं। महाराष्ट्र गुजरात का सीमावर्ती राज्य है जिससे भाजपा को नरेंद्र मोदी की छवि भुनाने का और भी ज्यादा मौका मिल रहा है।
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कांग्रेस-एनसीपी पिछड़ेंगी
मराठवाड़ा में भाजपा-शिवसेना गठबंधन का जोर है तो दूसरी तरफ विदर्भ में कांग्रेस भारी है। कोंकण और मुंबई जैसे इलाकों में लड़ाई बराबरी की है। यहां शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी का मिलाजुला वर्चस्व है।
राज्य की राजधानी मुंबई में लोकसभा की 6 सीटें हैं, जिनमें 3 सीटों पर भाजपा-शिवसेना गठबंधन की लहर नजर आ रही है। 2 सीटें कांग्रेस-एनसीपी और एक सीट पर आम आदमी पार्टी की मेधा पाटकर करिश्मा दिखा सकती हैं।
पश्चिमी महाराष्ट्र की सीटों पर भी भाजपा का जोर दिखाई दे रहा है। हालांकि राज्य में कांग्रेस की सरकार है, लेकिन कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को इसका लाभ मिलेगा, इस बात की संभावना कम है।
निरुपम के अभियान का असर नहीं
वोटरों को लुभाने के लिए हाल ही में कांग्रेस सांसद संजय निरुपम ने बिजली की दरें कम करने का अभियान शुरू किया था। हालांकि दरें कम भी हुईं लेकिन कांग्रेस को इसका कोई खास फायदा नहीं होता दिख रहा है।
महाराष्ट्र में बंपर नतीजों की उम्मीद लगाए बैठी बीजेपी के लिए राज ठाकरे चिंता का विषय बने हुए हैं।
हाल ही में राज ठाकरे ने महाराष्ट्र के मुंबई, कोल्हापुर समेत कई दूसरे इलाकों में टोल टैक्स न देने का अभियान छेड़ा था, जिसके बाद सरकार को कई टोल टैक्स नाकों को बंद करना पड़ा।
राज का उभरना भाजपा के लिए खतरा
चुनावों के ठीक पहले उग्र नीति कि वजह से राज ठाकरे चर्चा में हैं, लेकिन राज का उभरना भाजपा-शिवसेना के लिए नुकसानदायक हो सकता है। चुनावों के ठीक पहले भाजपा राज से रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रही है।
शिवसेना के लिए इस बार चुनावी राह आसान नहीं है। पार्टी अपने करिश्माई नेता बाल ठाकरे के निधन के बाद पहली बार चुनावी मैदान में उतर रही है। चुनावी मैदान का पूरा दारोमदार उद्धव ठाकरे पर है।
शिवसेना को डर है कि अगर उद्धव के करिश्मे में जरा भी कमी आई तो उनके परंपरागत वोटर राज ठाकरे के साथ जा सकते हैं। शिवसेना ने इस बार दिल्ली में अपनी दावेदारी पुख्ता करने के लिए भाजपा के साथ मिलकर राज्य की कई छोटी-छोटी पार्टियो के साथ हाथ मिलाया है।
आप-राज काटेंगे वोट
इसे ‘महायुति’ का नाम दिया गया है। इस महायुति में रामदास अठावले की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, सांसद राजू शेट्टी की पार्टी स्वाभिमानी शेतकारी संगठन प्रमुख हैं।
आज के माहौल में अगर आम आदमी पार्टी करिश्मा दिखाती है या फिर राज ठाकरे ज्यादातर सीटों पर उम्मीदवार खड़े करते हैं तो भाजपा-शिवसेना का चुनावी खेल बिगड़ सकता है।
यूपी के वोटों पर भाजपा की नजर
इस चुनावी महासमर में भाजपा चाहकर भी राज ठाकरे से सीधा जुड़ाव नहीं कर पा रही है। शिवसेना राज ठाकरे और भाजपा की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है, साथ ही राज की उत्तर भारतीय विरोधी राजनीति भी भाजपा को उनके साथ जाने से रोक रही है।
राज ठाकरे उत्तर प्रदेश और बिहार पर हमले करके वोट बैंक की पॉलिटिक्स करते हैं। ऐसे में अगर भाजपा राज ठाकरे के साथ जाती है तो उसे महाराष्ट्र में उत्तर भारतीय वोटों का नुकसान हो सकता है साथ ही उत्तर प्रदेश और बिहार में भी पार्टी के विरोधियों को नया मुद्दा मिल जाएगा।
आम आदमी पार्टी ने यूं तो राज्य की कई सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, लेकिन फिलहाल अभी वोटरों का रुझान आम आदमी पार्टी के पक्ष में कम नजर आ रहा है। इसकी बड़ी वजह लोकल संगठन के स्तर पर कमियां और स्थानीय मुद्दों का न होना है।
अभी तक के चुनावी मिजाज के मुताबिक आम आदमी पार्टी महाराष्ट्र या मुंबई की सीटों पर बहुत कुछ उलटफेर करती नजर नहीं आ रही है।