सरकारी नौकरियों में दलित व आदिवासी कर्मियों की पदोन्नति में आरक्षण विधेयक को लेकर भाजपा दुविधा में है। भाजपा अभी तक इस बिल का समर्थन और विरोध करने के बारे में फैसला नहीं ले सकी है। जहां सपा खुलकर इसका विरोध कर रही है, वहीं बसपा अपने वोट बैंक को ध्यान में रखकर इसके समर्थन में मोर्चा खोले हुए है लेकिन मुख्य विपक्षी पार्टी को इस मसले पर एक ओर कुआं तो दूसरी ओर खाई नजर आ रही है।
इसलिए राज्यसभा में पेश इस विधेयक को लेकर भाजपा असमंजस की स्थिति में है। पार्टी ने अभी तक इस मुद्दे अपने पत्ते नहीं खोले हैं। पार्टी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने सिर्फ यही कहा कि भाजपा सामाजिक न्याय के पक्ष में है। संविधान के दायरे में दलित व आदिवासी समुदायों को उनका हक दिए जाने के पक्ष में है, लेकिन कांग्रेस को बताना चाहिए कि वह सपा और बसपा के अड़ियल रुख के बीच इस मुद्दे का समाधान क्यों नहीं निकाल रही है। हालांकि माना जा रहा है कि भाजपा इस विधेयक के पक्ष में ही मतदान करेगी, क्योंकि वह दलित व आदिवासी समुदायों को नाराज करने का जोखिम लेने की स्थिति में नहीं है। संसद में सबसे ज्यादा दलित व आदिवासी समुदाय के सांसद भाजपा से ही हैं।
इस मामले पर भाजपा को खासतौर पर उत्तर प्रदेश को लेकर मुश्किल नजर आ रही है। भाजपा को आशंका है कि सपा के आरक्षण विरोधी रुख के चलते प्रदेश का सवर्ण उसके पाले में जा सकता है। दूसरी ओर भाजपा यदि खुलकर आरक्षण बिल का समर्थन करती है तो भी लाभ बसपा को ही मिलेगा। पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई लंबे समय से पार्टी हाईकमान पर लगातार दबाव बनाती रही है कि इस विधेयक पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए, लेकिन दुविधा के चलते पार्टी ने चुप्पी साध रखी है।