चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने का मौका हाथ लगने पर भाजपा पुराने और कद्दावर चेहरों की जगह नए और युवा चेहरों पर दांव लगाएगी।
दरअसल, ऐसा केंद्र के बाद राज्यों में भी पीढ़ी परिवर्तन की योजना को अमली जामा पहनाने की प्रक्रिया के तहत किया जाएगा।
पीढ़ी परिवर्तन की इसी प्रक्रिया के तहत सरोज पांडे को चुनाव हारने के बावजूद राष्ट्रीय महासचिव का ओहदा, भूपेंद्र यादव को सचिव पद से महासचिव पद पर पदोन्नति, झारखंड के रघुवर दास को सीधे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और मध्य प्रदेश के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को हरियाणा जैसे अहम राज्य का चुनावी जिम्मा दिया गया है।
केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों में भी तीसरी और युवा पीढ़ी को खड़ा कर संघ के मार्गदर्शन के अनुरूप 20 से 25 साल के नेतृत्व सूखे को खत्म करने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया है। केंद्रीय नेतृत्व की योजना एक साल में राज्यों में नेताओं की नई पीढ़ी तैयार करने की है।
विधानसभा जीतने की तैयारी
पार्टी हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में मौका मिलने पर युवा मगर ऊर्जावान चेहरे के हाथ में सरकार की कमान देगी। अगर जम्मू एवं कश्मीर में सरकार बनाने या सरकार में शामिल होने की स्थिति आती है तो इस राज्य में भी भाजपा बिल्कुल नए चेहरों पर ही भरोसा जताएगी।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक पीढ़ी परिवर्तन और नई पीढ़ी विकसित करने के मामले में केंद्रीय नेतृत्व की निगाहें उन राज्यों पर भी हैं जहां पार्टी न केवल मजबूत स्थिति में है, बल्कि सत्ता में भी है। इसी योजना के तहत छत्तीसगढ़ में सरोज पांडे, राजस्थान में भूपेंद्र यादव, झारखंड में रघुवर दास जैसे नेताओं का कद अचानक बढ़ा दिया गया।
हिमाचल प्रदेश के महासचिव जेपी नड्डा तो उड़ीसा से केंद्रीय धर्मेद्र प्रधान के कद को लगातार मजबूती दी जा रही है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि एक साल में न केवल राज्यों में सरकार के स्तर पर बल्कि संगठन के स्तर पर भी पीढ़ी परिवर्तन की छाप साफ देखी की जा सकेगी।
संघ का पुराना एजेंडा
भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन संघ का करीब एक दशक पुराना एजेंडा है। वर्ष 2004 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद से ही संघ भाजपा पर तीसरी पीढ़ी को आगे लाकर भविष्य के दो-तीन दशकों के लिए नेतृत्व का सूखा खत्म करने का दबाव डालता रहा है।
इसी रणनीति के तहत जहां संघ ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए पार्टी में तीसरी पीढ़ी के नेता नरेंद्र मोदी के नाम पर सहमति दी, वहीं अमित शाह के अध्यक्ष बनाने पर भी ऐतराज नहीं जताया।
बाद में संघ फार्मूले के तहत जहां मोदी ने अपनी टीम में बुजुर्ग नेताओं को जगह देने से परहेज किया, वहीं शाह ने संसदीय बोर्ड से पार्टी की संस्थापक तिकड़ी अटल, आडवाणी और जोशी से किनारा करने में हिचक नहीं दिखाई।