कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय को समर्थन देने की कौमी एकता दल की घोषणा के बाद वाराणसी संसदीय सीट का सियासी पारा गरम हो गया है।
कांग्रेस ने जहां मुस्लिम मतों में सेंधमारी रोकने के लिए मुस्लिमों के बीच पैठ बनाने की कवायद तेज कर दी है वहीं भारतीय जनता पार्टी ने कौएद-कांग्रेस गठजोड़ के बाद भूमिहार मतों को अपनी तरफ लाने के लिए पूर्व विधायक कृष्णानंद राय की पत्नी अलका राय को मैदान में उतार दिया है। वोटों की गुणा-गणित में आम आदमी पार्टी भी पीछे नहीं है और मुस्लिम बहुल और बुनकर इलाकों में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है।
कांग्रेस और कौमी एकता दल की नई सियासी गलबहियां ने दलों को वोटों की जोड़तोड़ के लिए नए सिरे से सक्रिय कर दिया है।
किधर जाएंगे मुस्लिम मतदाता
वाराणसी संसदीय सीट पर करीब सवा तीन लाख मुस्लिम मतदाता हैं। कांग्रेस को कौएद के समर्थन में माना जा रहा है कि मुस्लिम मतों का झुकाव कांग्रेस की तरफ बढ़ेगा। हालांकि एक धड़े का यह भी कहना है कि जो भी प्रत्याशी मोदी के खिलाफ मजबूत स्थिति में होगा, मुस्लिम मत उधर जा सकते हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने अपने प्रत्याशी को मजबूत स्थिति में लाने की चुनौती है। इस चुनौती से पार पाने के लिए कांग्रेस का हाईकमान भी जुटा है।
बुधवार को ही कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव गुलाम नबी आजाद ने न केवल शहर मुफ्ती और शहर काजी से मुलाकात कर जीत की दरख्वास्त की बल्कि बुनकर बिरादराना तंजीम बावनी के महतो से भी मिलकर कांग्रेस प्रत्याशी को समर्थन देने की मांग की।
कांग्रेस-कौएद के इस समीकरण की काट निकालने के लिए भाजपा ने कांग्रेस के भूमिहार प्रत्याशी के खिलाफ प्रचार के लिए भूमिहार को ही उतार दिया है।
मुस्लिम मतों के समीकरण को समझ रही आप
कौएद-कांग्रेस गठजोड़ की घोषणा के बाद भाजपा ने पूर्व विधायक स्व. कृष्णानंद राय की पत्नी अलका राय को प्रचार युद्ध के मैदान में उतार दिया है। अलका भूमिहार बहुल इलाकों में अजय के भाई अवधेश और अपने पति की हत्या के आरोपी के साथ ही कौएद-कांग्रेस के गठजोड़ के खिलाफ प्रचार कर रही हैं। साथ ही समाज से भी अपील कर रही हैं कि जो व्यक्ति भाई का नहीं हुआ वह समाज का क्या होगा।
वहीं हाल में ही कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए अवधेश सिंह की भूमिहारों में अच्छी पकड़ मानी जाती है और उन्हें भूमिहार बहुल इलाकों में ही प्रचार के लिए लगाया गया है। साथ ही मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण की संभावनाओं को मानते हुए रणनीति पर फिर से मंथन किया जा रहा है।
मुस्लिम मतों के समीकरण को आप भी समझ रही है। ऐसे में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता बुनकर बहुल और मुस्लिम इलाकों में जाकर उनकी समस्याओं को प्रमुखता से उठा रहे हैं। साथ ही अभी तक की सरकारों जिसमें भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा सभी शामिल हैं, द्वारा बुनकरों की अनदेखी का मुद्दा भी उठा रहे हैं।
हमेशा बंटता रहा है मुस्लिम वोट
कौमी एकता दल ने भले ही कांग्रेस प्रत्याशी को समर्थन की घोषणा की हो लेकिन वह सभी मुस्लिम मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करते हों, ऐसा भी नहीं है। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा के टिकट पर लड़े मुख्तार अंसारी को करीब 1.86 लाख वोट मिले थे।
भाजपा के डा. मुरली मनोहर जोशी 17 हजार से अधिक वोटों से जीते थे। तब माना गया था कि मुख्तार के पक्ष में एकतरफा वोट पड़े हैं। इसमें बसपा का काडर वोट भी शामिल था। वहीं, 2012 विधानसभा चुनाव की बात करें तो चार विधानसभा क्षेत्रों में लड़े कौमी एकता दल के प्रत्याशियों को कुल 40412 वोट ही मिले थे और पांचों विधानसभा क्षेत्रों पर लड़ी कांग्रेस को तकरीबन 1.78 लाख वोट।
ऐसे में कौएद-कांग्रेस का समीकरण गुल तो खिला सकता है लेकिन तब जब दोनों दल मुस्लिम मतों में सेंध लगने से रोक लें। अभी तक प्रचार में आम आदमी पार्टी अपने प्रचार तरीके से मुस्लिम मतों में सेंध लगाती दिख भी रही है। ऐसे में कांग्रेस और कौएद के सामने आप भी एक चुनौती के रूप में है।