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लालू-नीतीश से माया-मुलायम ले सकते हैं ये सबक

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लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की सुनामी में धराशायी हो चुके दलों को बिहार उपचुनाव के नतीजों ने संभलने की ताकत दी है। जदयू, राजद और कांग्रेस गठबंधन ने 60 फीसदी सीटों पर जीत दर्ज कर अन्य दलों को मोदी लहर को रोकने का रास्ता दिखाया है।
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उपचुनावों के नतीजों के बाद एक बार फिर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की दोस्ती की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। मायावती ने चंद दिनों पहले मुलायम सिंह यादव के साथ गठबंधन करने से इनकार कर दिया था।

गठबंधन का प्रस्ताव देने वाले राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को भी उन्होंने आड़े हाथों लिया था। हालांकि दोनों दलों की दोस्ती के समर्थक नेताओं ने अब भी कोशिशें बंद नहीं की हैं।
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जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने रविवार को लखनऊ में कहा था कि यूपी में भी बिहार की तरह धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक मंच पर लाने की कोशिशें की जा रही हैं और जल्द ही इसका खुलासा होगा।

गठबंधन रोक सकता है वोटों का बंटवारा

‌मुलायम सिंह यादव और मायावती को गठबंधन करने का प्रस्ताव राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने दिया था। हालांकि, मायावती ने कुख्यात गेस्टहाउस कांड की याद दिलाकर दोस्ती से इनकार कर दिया था।

गेस्टहाउस कांड की कड़वी यादों को दरकिनार कर दिया जाए तो लालू और नीतीश की दोस्ती में कई ऐसे सबक हैं, जो माया ओर मुलायम के काम आ सकते हैं। लोकसभा चुनावों में भाजपा को ‌बिहार में 22 सीटें और 29.4 फीसदी वोट प्राप्त किए थे। 20.1 फीसदी वोट पाकर भी राजद मात्र 4 सीटें ही जीत पाई, जबकि मात्र 6.4 फीसदी वोट पाने के बाद भी लोजपा 6 सीटें जीतने में कामयाब रही थी।

जदयू ने 15.8 फीसदी वोट पाया था, जबकि उन्हें मात्र तीन सीटें ही प्राप्त हुईं थीं, जबकि मात्र 3 फीसदी सीटें पाने वाली राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने भी तीन सीटें ही पाई थी। बिहार में भाजपा, लोजपा ओर रालोसपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था। लेकिन जदयू और राजद ने अलग-अलग। कांग्रेस और राजद से जरूर गठबंधन कर रखा था।

नतीजों से स्‍पष्ट था कि बिहार में विपक्ष के बंटे वोटों का लाभ भाजपा गठबंधन को मिला। विधानसभा उप चुनावों में जदयू-राजद-कांग्रेस का महागठबंधन वोटों के बंटवारे को रोकने में ह‌ी कामयाब रहा है।

उपचुनाव में लालू-नीतीश महागठबंधन को 45.23 फीसदी और भाजपा को 37.56 फीसदी वोट मिले हैं। यूपी में मुलायम सिंह यादव और मायावती गठबंधन करते हैं तो भाजपा के खिलाफ वोटों को बंटवारा रोकने में कामयाब हो सके हैं।

जातीय राजनीति के बजाय विकास का एजेंडा

लालू और नीतीश की दोस्ती को मंडल की राजनीति की वापसी के रूप में भी देखा गया। दोनों दलों के गठबंधन के बाद भाजपा ने तंज किया था कि बिहार में एक बार फिर जंगलराज की वापसी हो रही है।

हालांकि सोमवार को राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने भाजपा को अपने ही अंदाज में जवाब दिया। उन्होंने कहा, 'हमारे शासन में पूंजीपतियों के बजाय गरीबों का राज होता है, जो दूसरों को जंगलराज की लगता है।' वहीं, विकास के मुकाबले की जाति की राजनीति करने के मुद्दे पर जदूय नेता केसी त्यागी ने कहा कि जदयू-राजद-कांग्रेस का गठबंधन विकास और सामाजिक संतुलन के मुद्दे पर बना है, न कि जाति की राजनीति के मुद्दे पर।

उन्होंने बताया कि गठबंधन के एजेंडें में बिहार में भूमि सुधार और स‌िंचाई परियोजनाओं को पूरा करने जैसे मुद्दों को भी शामिल किया गया है। उत्तर प्रदेश में भी विकास के मुद्दे पर सामाजिक संतुलन की राजनीति करने वाले दलों को एकजुट करने की कोशिश की जा रही है।
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सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के खिलाफ एक मोर्चा

विकास के मुद्दे पर सत्ता में आई भाजपा जैसे-जैसे 'लव जिहाद' जैसे मुद्दों को केंद्र में ला रही है, सांप्रद‌यिक ध्रुवीकरण की राजनीति और तेज होती जा रही है।

विपक्षी दल ने भी भाजपा की रणनीति के खिलाफ मोर्चेबंदी शुरू कर दी है। लव‌ जिहाद जैसे मुद्दे पर सभी विपक्षी दलों ने एक सुर में भाजपा का विरोध किया है।

ऐसी अटकल है कि भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ यूपी में सपा, रालोद और कांग्रेस एकजुट हो सकते हैं। वाम दल और अन्य छोटी पार्टियों भी गठबंधन का हिस्सा बन सकते हैं। सांप्रदाकिय मोर्चे पर भाजपा के खिलाफ खुला हमला बोलने वाली मायावती के लिए भी ये अच्छा मौका हो सकता है।
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