भारतीय राजनीति में वंशवाद नई बात नहीं है लेकिन पूरी राजनीति सिर्फ वंश के इर्द गिर्द सिमट जाए तो फिर योग्यता और निष्ठा के प्रश्न खड़े हो जाते हैं। सवाल इसलिए भी खड़ा हो जाता है कि कई बार वंशवाद की ये बेल राजनीतिक दलों में योग्य प्रतिभाओं और अच्छे विकल्पों की राह में रोड़े बनकर खड़ी हो जाती है।
कई राजनीतिक दल इसका उदाहरण भी हैं। बीते लोकसभा चुनावों में करारी हार के बावजूद कांग्रेस आज तक गांधी परिवार की छाया से उबरने की हिमाकत नहीं कर पाई है तो उत्तर प्रदेश में पूरी राजनीति ही मुलायम कुनबे के इर्द गिर्द सिमट गई है।
मुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री और छह सांसदों वाला ये परिवार शायद देश का सबसे समृद्ध राजनीतिक परिवार है। एक अनुमान के मुताबिक मुलायम परिवार के कम से कम 15 सदस्य सक्रिय राजनीति में विभिन्न पदों पर काबिज हैं। आलम ये है कि मुलायम की चौथी पीढ़ी भी राजनीति में आने को तैयार बैठी है। हाल ही में खबर ये भी आई है कि बंदायू से सांसद धर्मेन्द्र यादव की बहन को भी जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए दावेदार बना दिया गया है।
मतलब साफ है कि यूपी की राजनीति में मुलायम परिवार की ये बेल अभी और भी लंबी होगी। आइए एक बार निगाह डालते हैं देश के दिग्गज राजनीतिक परिवारों और उनके सदस्यों पर।
नेहरू-गांधी परिवार की छत्रछाया में कांग्रेस
राजनीतिक दल में परिवार की बात करें तो सबसे पहला नाम जेहन में देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की सत्ता पर काबिज नेहरू-गांधी परिवार का ही आता है।
शुरूआत जवाहर लाल नेहरू के देश का पहला प्रधानमंत्री बनने से हुई तो उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने भी देश की बागडोर संभाली। इंदिरा की मौत के बाद उनके बेटे राजीव गांधी ने पार्टी और देश पर शासन किया।
राजीव की मौत के बाद सोनिया गांधी राजनीति में आई तो मात्र दो महीनों में ही कांग्रेस की कमान उनके हाथों में आ गई। वो खुद सांसद बनी तो उनके बेटे राहुल गांधी भी संसद की चौखट तक पहुंचे। चर्चा उनकी बेटी प्रियंका गांधी के भी राजनीति में आने की चली क्योंकि कांग्रेसियों को उनमें पूर्व प्रधानमंत्री और अपनी दादी इंदिरा गांधी की झलक दिखती थी लेकिन ये मामला चर्चाओं से आगे नहीं बढ़ सका।
हालांकि उनके पति रॉबर्ट वाड्रा जरूर गाहे बगाहे सक्रिय राजनीति में आने का संकेत दे चुके हैं लेकिन कांग्रेस को शायद अभी उनकी सेफ लैंडिंग का इंतजार है।
यूपी में सबसे बड़ी मुलायम परिवार की बेल
भारतीय राजनीति में वंशवाद का सबसे बड़ा चेहरा हैं समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव। कभी स्कूल में मास्टर और अखाड़े के पहलवान रहे मुलायम राजनीति के भी सिरमौर हैं। चरण सिंह की शागिर्दी में राजनीति शुरू करने वाले मुलायम ने समाजवादी लोहिया का दामन थामकर ही समाजवादी पार्टी की स्थापना की और फिर यूपी की राजनीति में शिखर तक पहुंचे।
इसके बाद उन्होंने खुलकर अपने परिवार को आगे बढ़ाया। आज उनके बेटे अखिलेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री हैं तो छोटे भाई शिवपाल यादव कैबिनेट मंत्री। मुलायम खुद आजमगढ़ से सांसद हैं तो उनकी बहू डिंपल यादव कन्नौज से, भतीजे धर्मेन्द्र यादव बंदायू से, पौत्र तेज प्रताप मैनपुरी से और एक अन्य भतीजे अक्षय यादव फिरोजाबाद से सांसद हैं।
इतना ही नहीं अक्षय के पिता और पार्टी के मुखर चेहरे प्रो रामगोपाल राज्यसभा में सपा की नुमाइंदगी करते हैं। इसके अलावा मुलायम के पैतृक गांव सैफई की ब्लाक प्रमुख उनकी बहू मृदुला यादव हैं, तो एक और भतीजे अंशुल यादव हाल ही में जिला पंचायत चुनाव जीतकर अध्यक्ष पद के दावेदार बन बैठे हैं।
बंदायू के सांसद धर्मेन्द्र यादव की बहन शीला यादव भी जिला पंचायत अध्यक्ष की प्रत्याशी हैं। यही नहीं मुलायम के बहनोई प्रधानाचार्य अंजट सिंह यादव ने भी हाल ही के पंचायत चुनावों में अपनी किस्मत आजमाई है। मुलायम के एक और भतीजे अभिषेक यादव पार्टी की युवा इकाई युवजन सभा के राष्ट्रीय सचिव हैं।
बेटों के बाद बेटी को राज्यसभा पहुंचाने की तैयारी में लालू
मुलायम जैसा ही हाल कुछ कुछ उनके समधी और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव का भी है। चारा घोटाले में सजा पाने के बाद लालू यादव खुद तो चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य साबित हो गए लेकिन उन्होंने अपने परिवार को राजनीति में फिट करने के लिए जरूर पूरी सेटिंग कर ली है।
हाल ही के विधानसभा चुनावों में उनके दोनों बेटे तेज प्रताप और तेजस्वी जीत दर्ज कर कैबिनेट मंत्री बन बैठे हैं तो 80 विधायकों के दम पर लालू ने राज्यसभा में भी अपनी ताकत बढ़ाने की पूरी तैयारी कर ली है।
अगले साल राज्यसभा में बिहार कोटे की जेडीयू की पांच सीटें खाली होंगी। इनमें से दो सीटों पर लालू यादव ने अभी से दावेदारी जता दी है, जिस पर वो अपनी डॉक्टर बेटी मीसा भारती और पत्नी राबड़ी देवी को भेजकर दिल्ली की राजनीति में भी दबदबा कायम करने की तैयारी में हैं।
राजनीति की इसी तिगड़म का उस्ताद होने के लिए उन्हें किंगमेकर कहा जाता है। मुलायम परिवार के अलावा उनके साले साधु यादव भी लालू के सहारे सांसदी प्राप्त कर चुके हैं।
तमिलनाडु में राजनीति के शिखर पुरुष करुणानिधि
भारतीय राजनीति में तीसरा सबसे बड़ा कुनबा है तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि का। एम करुणानिधि की पार्टी द्रविड मुन्नेत्रम कषगम तमिलनाडु में दूसरा सबसे बड़ा दल है। 1969 में डीएमके के संस्थापक सीएनअन्नादुरई के बाद करुणानिधि ने पार्टी की कमान संभाली और राज्य के मुख्यमंत्री बने।
तमिल फिल्मों के पटकथा लेखक रहे करुणानिधि ने 60 साल के लंबे राजनीतिक जीवन में दूसरों के मुकाबले परिवार के सदस्यों को राजनीति में ही आगे बढ़ाया। उनके दोनों बेटे एमके स्टालिन और अलगिरी मेयर और विधायक रहे हैं। जबकि उनकी बेटी कनिमोझी सांसद रह चुकी हैं।
हालांकि 2जी घोटाले में उन्हें जेल जाना पड़ा था। इसके अलावा करुणानिधि के भतीजे ए राजा और भतीजे मुरासोली मारन के पुत्र दयानिधि मारन केन्द्र में मंत्री भी रह चुके हैं। दायानिधि के पिता मुरासोली भी करुणानिधि की उंगली पकड़ कर राजनीति में शीर्ष तक पहुंचे और केन्द्र में मंत्री रहे।
इसके अलावा करुणानिधि और मारन परिवार ने राजनीतिक रसूख की बदौलत ही अकूत दौलत इकट्ठा की है। दयानिधि के भाई कलानिधि खरबों की हैसियत वाले सन टीवी के मालिक हैं तो करुणानिधि के बेटे स्टालिन का भी बड़ा कारोबार है।
सिंधिया घराने का भाजपा कांग्रेस दोनों में जलवा
भारतीय राजनीति में एक और परिवार बड़ी रसूख रखता है। वो है मध्यप्रदेश का सिंधिया घराना। खास बात ये है कि इस परिवार के सदस्य देश के दो सबसे बड़े दलों भाजपा और कांग्रेस दोनों में बराबर रसूख रखते हैं। भाजपा में जहां ग्वालियर घराने की राजमाता विजयाराजे सिंधिया का विशेष सम्मान रहा तो कांग्रेस में उनके पुत्र माधवराव सिंधिया का बोलबाला रहा।
कांग्रेस से अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत करने वाली राजमाता का जल्द ही इस पार्टी से मोहभंग हो गया और उन्होंने उस दौर की जनसंघ रही भाजपा का दामन थाम लिया। जबकि उनके बेटे माधवराव सिंधिया शुरू से ही कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में शामिल रहे।
माधवराव की आकस्मिक मौत के बाद उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया सांसद और फिर केन्द्रीय मंत्री बने। राजमाता के साथ ही उनकी बेटियों ने भी राजनीति में बड़ा मुकाम पाया।
उनकी बड़ी बेटी और धौलपुर की महारानी वसुंधरा राजे कई बार सांसद और केन्द्रीय मंत्री रहने के बाद दूसरी बार राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं तो उनके पुत्र दुष्यंत सिंह धौलपुर से सांसद। राजमाता की दूसरी बेटी यशोधरा राजे सिंधिया मध्यप्रदेश के शिवपुरी से विधायक रह चुकी हैं।
पंजाब पर राज कर रहा बादल परिवार
पंजाब की राजनीति में बादल परिवार आज भी सत्ता की धुरी बना हुआ है। शिरोमणि अकाली दल के मुखिया प्रकाश सिंह बादल पांचवी बार पंजाब के मुख्यमंत्री हैं तो उनके पुत्र सुखबीर सिंह बादल उप मुख्यमंत्री। उनकी बहू हरसिमरत कौर केन्द्र में कैबिनेट मंत्री के पद पर काबिज हैं।
कुछ इसी तरह जम्मू कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार का जलवा आज भी कायम है। शेख अब्दुल्ला कश्मीर के पहले मुख्यमंत्री रहे तो उनके बेटे फारुख अब्दुल्ला भी कई बार मुख्यमंत्री के अलावा केन्द्र में मंत्री पद संभाल चुके हैं। फारुख ने ढलती उम्र और बीमारियों में खुद को घिरता देख अपनी विरासत बेटे उमर अब्दुल्ला को सौंप दी।
बीते चुनाव तक वो भी राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इससे पूर्व वह एनडीए और यूपीए दोनों सरकारों में मंत्री रह चुके हैं। कई राज्यों में मुख्यमंत्री का पद तो आज भी वंश बेल की तरह ही चलता है। उड़ीसा के मुख्यमंत्री रहे बीजू पटनायक की मौत के बाद उनके बेटे नवीन पटनायक आज भी मुख्यमंत्री हैं।
यूपी के मुख्यमंत्री रहे हेमवती नंदन बहुगुणा के पुत्र विजय बहुगुणा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे हैं तो जाट बहुल राज्य हरियाणा में ताऊ देवी लाल के बाद उनके बेटे ओमप्रकाश चौटाला मुख्यमंत्री रहे। चौटाला ने अपनी विरासत बेटे अभय और अजय चौटाला में बढ़ा दी। आज चौटाला खानदान की चौथी पीढ़ी के चिराग दुष्यंत चौटाला हिसार से सांसद हैं। हरियाणा के ही पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र हुड्डा के पुत्र दीपेन्द्र हुड्डा कई बार से सांसद हैं।
राजनीतिक बेल के जरिए बढ़ रहे अजित सिंह
वंशवाद की बेल दक्षिण के प्रमुख राज्य आंध्र प्रदेश में भी दशकों से अपना कब्जा जमाए हुए है। आंध्र के वर्तमान मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू पूर्व मुख्यमंत्री और लोकप्रिय नेता रहे एनटीरामाराव के दामाद हैं, तो पूर्व मुख्यमंत्री और आंध्र में कांग्रेस के शिखर पुरुष रहे वाईएसआर रेड्डी के बाद उनके बेटे जगन रेड्डी उनकी विरासत को ही आगे बढ़ा रहे हैं।
इसके अलावा महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार के दबदबे से कौन वाकिफ नहीं होगा। शिवसेना मुखिया बाल ठाकरे कभी चुनाव नहीं लड़े लेकिन महाराष्ट्र की पूरी राजनीति हमेशा उनके ही इर्द गिर्द सिमटी रही। आज उनके बेटे उद्धव और भतीजे राज ठाकरे उसी अंदाज में अपनी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
दोनों नेताओं के बेटों ने भी राजनीति में अपने कदम उसी अंदाज में बढ़ा दिए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह के बेटे अजित सिंह ने भी पिता के नाम को खूब भुनाया और अलग अलग सरकारों में सत्ता की मलाई काटते रहे। एक समय अजित ने अपने बेटे जयंत और बहन को भी संसद तक पहुंचा दिया था।
एक अनुमान के मुताबिक आज लोकसभा में आने वाले सांसदों में से एक चौथाई राजनीतिक घरानों से ही ताल्लुक रखते हैं। हालांकि ये संख्या पिछली लोकसभा के मुकाबले इस बार कुछ कम हुई है जिसकी प्रमुख वजह भाजपा जैसे दल का स्पष्ट बहुमत पाना है जिसमें अन्य दलों के मुकाबले राजनीतिक विरासतों को इतना संरक्षण नहीं मिल पाता। लेकिन ये सिलसिला आने वाले समय में कम हो पाएगा इसकी उम्मीद करना बेमानी है।