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'इसराइल की एकतरफा आलोचना सही नीति नही'

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गजा पर इसराइली हमले के मुद्दे पर मोदी सरकार की विदेश नीति की कांग्रेस समेत सभी विपक्ष आलोचना कर रहा है। लेकिन बीजेपी ने इसे निष्पक्ष विदेश नीति की शुरुआत कहा है।
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बीजेपी के विदेश मामलों के प्रकोष्ठ के संयोजक शेषाद्रि चारी का कहना है कि अब तक इसराइल की एकतरफा आलोचना वोटबैंक की राजनीति के कारण होती रही है। भारत को फलस्तीन के साथ ही इसराइल की भी जरूरत है।

गजा के घटनाक्रम के मद्देनजर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद एक आपात बैठक बुला रही है तो उधर गजा में नाजुक युद्धविराम फिर खत्म हो गया है जिससे और भी ज्यादा लोग हताहत हो रहे हैं।
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गजा में जारी संघर्ष में इस्लामी समूह हमास के रॉकेट हमलों और इसराइल के हवाई हमलों से मारे जाने वाले लोगों के प्रति किसी के भी दिल में सहानुभूति पैदा होगी।

हालांकि इसराइल की आलोचना और गजा में सक्रिय सभी तत्वों की तारीफ की जल्दबाजी के बाद जरूरी हो जाता है कि करीब-करीब असंभव शांति प्रक्रिया का वास्तविक विवेचन किया जाए।
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धर्मनिरपेक्षता का सवाल

इसराइल की आलोचना का चलन एक बार फिर चल पडा है और भारत के स्व-घोषित 'धर्मनिरपेक्ष' वामदल स्थिति की ऐतिहासिक सच्चाई की ओर आंखें मूंद कर वर्तमान स्थिति को लेकर बेहद अतिरंजित बयान जारी कर रहे हैं।

इसकी पुष्टि तब हुई जब 15 जुलाई को मोदी सरकार ने, एक तरह से परंपरा बन चुकी, उस मांग को अस्वीकार कर दिया कि संसद एक प्रस्ताव पारित कर गजा में हमलों की निंदा करे।

अगर 'धर्मनिरपेक्ष' विपक्ष यह उम्मीद कर रहा था कि इस बार भी चीजें पहले की तरह ही होंगी तो उन्हें तगडा धक्का लगा।

सरकार ने इस मामले में कोई ढील नहीं दी और गजा में जारी घटनाक्रम पर लोकसभा में, जहां उसके पास पूर्ण बहुमत है, चर्चा से इनकार कर दिया।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने इस पर चर्चा करने से साफ इनकार करते हुए कहा कि इससे बहुत गलत संकेत जाएगा क्योंकि भारत के इसराइल और फलस्तीन दोनों के साथ बराबरी के रिश्ते हैं।

लेकिन राज्यसभा में स्थिति अलग थी क्योंकि वहां विपक्ष के पास संख्याबल है, कम से कम शोर मचाने लायक तो है।

'विपक्ष पर भरोसा करना मुश्किल है'

गैर-एनडीए दलों के दिखावे को गंभीरता से लेना बहुत मुश्किल है। अरब जगत से भारत के नजदीकी संबंधों की प्रमुख वजह तो यह है कि हमारी पश्चिमी एशिया के तेल पर निर्भरता और खाडी में बडी संख्या में भारतीयों की मौजूदगी।

भारत की विश्वसनीय वैकल्पिक ऊर्जा ढूंढ पाने में नाकामी की वजह से पश्चिमी एशिया पर हमारी निर्भरता बढी है और हम अधिक यथार्थवादी रुख अपनाने को स्वतंत्र नहीं हो पाए हैं। हालांकि उनमें से कोई भी जम्मू-कश्मीर और 'आतंकवाद' जैसे मुद्दों पर हमारे पक्ष में कभी खडा नहीं हुआ है।

सभी सरकारों ने इसराइल के साथ संभलकर सबंध बनाए रखने की नीति अपनाई है और उसी समय अरब जगत के साथ लेन-देन किया है।

यह भी विचित्र बात है कि भारत का वह राजनीतिक वर्ग जिसने कभी भी कश्मीरी हिंदुओं की दुर्दशा पर आक्रोश नहीं जताया, न ही इराक या अन्य जगहों पर सुन्नी आतंकी गुटों द्वारा मारे जा रहे शिया मुसलमानों पर कुछ कहा, वह गजा पर इतना शोर मचा रहे हैं।

'वोट बैंक को रिझाने के ‌‌लिए किए जा रहे हैं प्रयास'

ऐसे में किसी को भी यह संदेह हो सकता है कि इसराइल पर हमले अपने वोट बैंक को रिझाने के लिए, राजनीतिक फायदा उठाने के लिए किए जा रहे हैं।

भारत ने संघर्ष विराम का पुरजोर समर्थन किया है और आम नागरिकों की हत्या की निंदा की है, खासतौर पर महिलाओं और बच्चों की।

भारत सरकार उन तथ्यों से भी अवगत है जो सीमा से लगे पूरे इलाके में इसराइली नागरिक क्षेत्रों में रॉकेट हमलों में सीधे हमास की भागीदारी की ओर इशारा करते हैं। इस जानकारी को दरकिनार कर इसराइल की एकतरफा आलोचना निष्पक्ष विदेश नीति के लिए अनुपयुक्त होगी।

इस तरह की पूर्वाग्रह वाली कार्रवाई ऐसी पार्टियों और संगठनों को तो सही लगेगी जो भेदभाव की राजनीति करते हैं लेकिन भारत के राष्ट्रीय हित और भौगोलिक हकीकतें एक अलग मामला है।

'यह संघर्ष इसराइल और हमास के बीच है'

पूरी सीमा पर अपने शत्रुतापूर्ण पडोसियों के आतंकी हमले झेल रहे इसराइल का लगातार जारी विरोध के चलते भारतीय लोगों को उससे स्वाभाविक सहानुभूति होती है।

हालांकि भारत को ऊर्जा और सुरक्षित नौकरी के लिए तेल से समृद्ध अरब देशों की जरूरत है लेकिन हम मजबूत सुरक्षा संबंधों के लिए इसराइल पर भी निर्भर हैं।

जहां तक वर्तमान गजा संकट का सवाल है इस वक्त सूक्ष्म भेदयुक्त रास्ता ही सर्वश्रेष्ठ तरीका है। यह संघर्ष इसराइल और हमास के बीच है, इसराइल और फलस्तीनियों के बीच नहीं।

और जो लोग इस मामले में गले फाडकर चिल्ला रहे हैं और खुद को फलस्तीनी हित के लिए काम करने वाले चैंपियन समझ रहे हैं उन्हें यह याद रखना चाहिए कि यह मामला बाइबिल के समय से चला आ रहा है।

भारत की संसद में प्रदर्शन करने और चिल्लाने तथा वॉक आउट करने से गजा, तेल अवीव, यरूशलम, और रमाल्लाह की स्थिति में लेशमात्र भी फर्क नहीं पडेगा।
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'हमास एक 'इस्लामिक आतंकी गुट' है'

हमास एक 'इस्लामिक आतंकी गुट' है और और यकीनन भारत का दोस्त नहीं है।

यकीनन कोई भी चाहेगा कि गजा में जारी जंग वार्ता से हल हो, हिंसा से नहीं। जहां हम चाहते हैं कि यह संघर्ष जल्द खत्म हो वहीं भारत की संसद को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग करनी चाहिए और इसमें सिर्फ गजा ही नहीं दुनिया भर में तमाम संघर्ष की जगहों पर विचार किया जाए।

इसराइल को शैतान घोषित करने या सिर्फ हमास को फटकारने से सिर्फ शोर ही बढेगा कोई परिणाम हासिल नहीं होगा।
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