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भागलपुरः जब मालिक बन गए मजदूर

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बिहार के भागलपुर की पहचान रेशमी शहर की भी है। कपडा उद्योग से मिली इस पहचान का आधार बुनकर हैं जो ज्यादातर मुसलमान हैं।
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1989 में हुए दंगों से भागलपुर का कपडा उद्योग भी बुरी तरह प्रभावित हुआ था। दंगों के 25 साल बाद भी यह उद्योग उस समय लगे झटके से बाहर नहीं आ पाया है।

रेशमी कपडों के व्यापार और निर्यात का केंद्र रहा भागलपुर अब जरूरत भर उत्पादन ही कर पा रहा है।

दंगों के बाद यहाँ अपना रेशमी कपडों का उद्योग चलाने वाले कई लोगों को मजदूर बना दिया।
मौजूदा हालात पर रोशनी डालती मनीष शांडिल्य की रिपोर्ट

भागलपुर से दस किलोमीटर दूर चंपानगर और नाथनगर में दाखिल होने से पहले ही खट-खट की आवाज कानों में पहुँच जाती है।

ये आवाज बताती है कि ये इलाका बुनकरों से आबाद है।

यहाँ हजारों बुनकर परिवार रहते हैं जो बुनाई के साथ-साथ इस पेशे से जुडे सूत तैयार करने और रंगाई जैसे दूसरे काम भी करते हैं।

'बंधुआ मजदूर जैसे'

मतीन अंसारी पारंपरिक बुनकर परिवार से आते हैं लेकिन काम की कमी और अनिश्चित आमदनी के कारण अब वे कपडा रंगाई का काम करते हैं।

दंगे के कारण कई महीने तक मतीन जैसे बुनकर लगभग बेरोजगार रहे और उनकी जमा पूंजी खत्म हो गई। आगे के खर्च के लिए उधार लेना पडा।

अनेक बुनकर आज महाजन के चुंगल में फंसकर बंधुआ मजदूर जैसे ही बन गए हैं।

चंपानगर के राशिद अंसारी के मुताबिक, "बुनकर अब अपने परिवार का पालन-पोषण ठीक से नहीं कर पा रहे हैं जिससे युवा पीढी का यहाँ से पलायन बढा है।"

सूरत, मेरठ, मुंबई जैसे कपडा उद्योग के बडे केंद्रों में आज भागलपुर के बुनकर मजदूरी कर रहे हैं।

यहाँ के तांतीबाजार में रहने वाले सज्ज्न कुमार के अनुसार न तो बुनकरों को उचित मजदूरी मिलती है और न ही उनके माल को उचित कीमत।
कतरनों से शानदार कपडे

भागलपुर के बुनकर आज न्यूनतम सरकारी सुविधाओं के बावजूद अपनी मेहनत और हुनर के बल पर अपनी पहचान बचाए हुए हैं।

साथ ही समय-समय पर ये अपनी रचनात्मकता से लोगों को चौंकाते भी हैं।

सिल्क टेक्नोलोजिस्ट मोहम्मद जाकिर हुसैन बताते हैं कि यहां के बुनकरों ने हाल के दिनों में बनारस के साडी उद्योग की कतरन और बचेखुचे माल से शानदार कपडे तैयार करना शुरु किया है।

जाकिर कहते हैं, "यह काम रद्दी से सोना तैयार करने जैसा है जिसकी मांग विदेशों में भी है।"

लेकिन हुनर और जीवटता के बावजूद बुनकर समुदाय अब शिद्दत से चाहता है कि सरकार उन्हें मशीन, तकनीकी प्रशिक्षण, पूंजी और सब्सिडी की मदद दे।

मतीन अंसारी का मानना है कि दंगे के बाद बडे पैमाने पर बुनकरों ने अपना परंपरागत पेशा छोडा है और सरकारी मदद के बिना आने वाले दशकों में उनका अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो सकता है।
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‘सरकार तत्पर’

सरकार ने बुनकरों के लिए समय-समय पर सूत बैंक, सिल्क हाट, टेक्सटाइल पार्क, सिल्क संस्थान जैसी पहल और घोषणाएं की गई हैं।

इनमें से कुछ या तो जमीन पर उतरी ही नहीं या फिर शुरुआत के कुछ ही दिनों बाद बंद हो गईं। भागलपुर के बुनकरों को अब भी इनसे बडी आस है।

भागलपुर के जिलाधिकारी डॉक्टर बीरेंद्र प्रसाद यादव मानते हैं, "कुछ कारणों से सरकार बुनकरों को सभी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाई है। हाल के दिनों में सरकार ने बुनकरों के बिजली माफ करने से लेकर उनको क्रेडिट कार्ड उपलब्ध कराने और प्रशिक्षण की व्यवस्था की है।"

उनके अनुसार सरकार सिल्क संस्थान को पुनर्जीवित करने और भागलपुर जिले के शाहकुंड इलाके में टेक्सटाइल पार्क की स्थापना को तत्पर है।

शायद सरकार की पहल से मालिकों से मजदूर बने ये बुनकर फिर मालिक बनने का सपना देख सकें।

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