पति की मौत के बाद परिवार पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा था। तीन छोटे बच्चों को पालना, उन्हें पढ़ाना-लिखाना एक अकेली महिला के लिए इतना आसान न था, मगर अतरौलिया की दुर्गावती ने हिम्मत नहीं हारी।
उसने लोगों के आगे हाथ फैलाने के बजाए गली-गली घूमकर सब्जी बेचकर अपने बच्चों को काबिल बनाना शुरू किया। आज की तारीख में वह एक बिटिया की शादी कर चुकी है।
दूसरे की तैयारी में जुटी है, जबकि बेटे को पढ़ाने में भी वह कोई कसर नहीं छोड़ रही। दुर्गावती के हौसले की सभी तारीफ करते हैं। करें भी क्यों न वह समाज के लिए मिसाल जो बन चुकी है।
नगर पंचायत अतरौलिया के खानपुर फतेह निवासी दुर्गावती की शादी चुन्नी लाल से हुई थी। पति साइकल से गांव-गांव सब्जी और फल बेचकर परिवार का खर्च चलाता था। नवंबर 1998 में चुन्नी लाल की मौत हो गई।
इसके बाद 34 साल की दुर्गावती के सामने एकबारगी पूरा भविष्य अंधकारमय हो गया। दो पुत्रियों रेखा और सुलेखा तथा एक पुत्र विष्णु के परवरिश की जिम्मेदारी उस पर आ गई। घर में कोई कमाने वाला न बचा।
लेकिन दुर्गावती ने रोने-धोने और किस्मत को कोसने के बजाय बच्चों की जरूरतें और उन्हें शिक्षित करने की चुनौतियों को स्वीकार किया। उसने अपने सिर पर सब्जियों की दौरी रख ली और निकल पड़ी गांव-गांव बेचने। आज यही उसका पेशा बन चुका है।
इसी के बल पर वह परिवार का भरण पोषण कर रही है। शुरुआती दिनों की परेशानियों को याद करते हुए दुर्गावती ने बताया कि पति की मौत के बाद रोजी-रोटी की चिंता उसे हर समय खाए जा रही थी।
अंतत: बच्चों की क्षुधा शांत करने, उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए मैंने पति का ही रोजगार संभालने का फैसला किया। आगे चलकर लोग मेरा सहयोग करने लगे और मेरे लिए परिवार को पालना आसान हो गया।
उसका कहना है कि अगर हौसला हो तो बड़ी से बड़ी कठिनाइयों का सामना किया जा सकता है। दुर्गावती ने पढ़ाने-लिखाने के बाद अपनी बड़ी बेटी रेखा की शादी कर दी, जबकि छोटी बेटी सुलेखा के लिए भी वह वर ढूंढ रही है। उसका पुत्र विष्णु कक्षा 10 में पढ़ रहा है।