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बिन बेटी के बेटे वालों, किससे ब्याह रचाओगे...

Fri, 03 Jan 2014 12:48 PM IST
अमर उजाला, झांसी
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‘अब भी जागो, सुर में रागो, भारत मां की संतानों, बिन बेटी के बेटे वालों, किससे ब्याह रचाओगे, बहन न होगी, तिलक न होगा, किसके वीर कहलाओगे, सिर आंचल की छांह न होगी, मां का दूध लजाओगे।’
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कवि शंकर कलाकार यादव की यह पंक्तियां झांसी मंडल में घटते लिंगानुपात की चिंता को साफ बयां करती हैं। बेटी को बोझ समझने की सोच के कारण वर्तमान में झांसी, ललितपुर और जालौन के लिंगानुपात में बेटियों की संख्या कम हो रही है।

यह भयावह तस्वीर हमारे सामने है, लेकिन उसके बाद भी हमें इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता कि आखिर हम क्या और क्यों कर रहे हैं। पुरुष प्रधान समाज में बेटी को न तो उतना प्यार मिलता है और न ही दुलार है।
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लालन - पालन और शिक्षा क्षेत्र में भी भेदभाव किया जाता है। आखिर कब तक हम बेटी को मजबूरी समझने वाली मानसिकता से बंधे रहेंगे। आखिर कब तक गर्भ में ही बेटियां मारी जाती रहेंगी, आखिर कब तक बेटी को बेटे के बराबर हक नहीं मिलेगा, इन सवालों के जवाब में ही आने वाले कल का भविष्य छुपा हुआ है।

अब जरा आंकड़ों पर गौर करें। प्रत्येक दशक भारत में होने वाली जनगणना में गिरते लिंगानुपात के कारण जनसंख्या का ग्राफ असंतुलित हो रहा है। वर्ष 1991 के आंकड़े बताते हैं कि ललितपुर जिले में प्रति एक हजार पुरुषों की तुलना में 928 महिलाएं थीं।

जबकि, वर्ष 2001 में 1000 पुरुष और 931 महिलाएं थीं। वर्ष 2011 में यह अनुपात गिरकर 1000 पुरुष के मुकाबले 914 महिलाओं का हो गया। इससे ज्यादा चिंता के आंकड़े जालौन जिले में हैं।

वर्ष 1991 में यहां प्रति 1000 पुरुष पर 910 महिलाएं थीं। वर्ष 2001 में 1000 पुरुष और 889 महिलाएं, जबकि वर्ष 2011 में यह अनुपात गिरकर 1000 पुरुष पर 880 महिलाओं का हो गया। झांसी की स्थिति तो और भी चिंताजनक है।

वर्ष 1991 में यहां प्रति 1000 पुरुष पर 921 महिलाएं थीं। वर्ष 2001 में 1000 पुरुष और 887 महिलाएं थीं, जबकि वर्ष 2011 में यह अनुपात गिरकर 1000 पुरुष पर 859 महिलाओं का हो गया।

हर दशक में लिंगानुपात में बढ़ता अंतर भविष्य के लिए हमें आगाह कर रहा है। अभी नहीं चेते तो इस सृष्टि की जननी को ढूंढना आसान नहीं होगा। अंतत: यह मनोवृत्ति समाज के लिए घातक ही साबित होगी।
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