''हवा तू मुझे ले चल मथुरा उड़ा कर, मुझे मुरली वाले की याद आ रही है"। मैंने तक़रीबन 45 साल पहले जन्माष्टमी के मौके पर एक फ़िल्मी गाने की तर्ज पर बना यह भजन 24 घंटे लगातार चलने वाले अखंड कीर्तन में गाया था। मैंने आज जब पूर्व पुलिस अधिकारी जुलियो रिबेरो का लेख पढ़ा, मुझे अचानक उस जन्माष्टमी की याद आ गयी। रिबेरो ने कुछ दिन पहले कुछ गिरजाघरों पर हुए हमलों के बाद अपनी निराशा जताते हुए यह लेख लिखा था।
पढ़ें लेख विस्तार से
बात उस समय की है जब हम लोग नई दिल्ली में तिलक ब्रिज से मिंटो ब्रिज को मिलाने वाली राउज़ एवेन्यू रोड पर रहते थे, जिसे आज कल दीनदयाल उपाध्याय मार्ग के नाम से जाना जाता है।
अखंड कीर्तन में ईसाई का भजन
हमारा मकान नंबर दो था और उससे सटे तीन नंबर मकान में पंडित रामचरण और उनका परिवार रहता था। हालांकि पंडित रामचरण सरकारी नौकरी में थे, लेकिन वो और उनके दो बेटे रामनाथ और रामाधार लोगों के घरों पर पूजा-पाठ और हवन इत्यादि भी कराते थे और साथ ही कीर्तन पाठ भी। उस जन्माष्टमी को इन्हीं पंडित रामचरण के घर के सामने 24 घंटे का अखंड कीर्तन था। लेकिन कीर्तन अभी 6-7 घंटे ही चला था की अचानक मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी।
तेज़ हवा की वजह से पंडाल तक उड़ गया। कीर्तन में गाने वाली मंडलियों का भी दूर तक नामो-निशान तक नहीं था। लेकिन क्योंकि कीर्तन 6-7 घंटे चल चुका था इसलिए उसे रोकना अपशुकन हो सकता था।
चिमटे से पड़े छाले
तेज़ बारिश में किशन जी की भव्य मूर्ति के सामने सिर्फ पंडित रामनाथ और उनके बेटे किसी तरह कीर्तन को जारी रखे हुए थे। लेकिन ऐसा कब तक चलता?
तब मेरे पिताजी ने मुझे और मेरे बुआ के लड़के को कहा की जाकर हम भी गाना गाएं ताकि अखंड कीर्तन चलती रहे। मैंने करीब तीन घंटे चिमटा बजाते हुए पंडित जी के साथ स्वर मिलाया और जब बारिश रुकने के बाद भजन मंडलियां आईं तो अखंड कीर्तन पूरा हुआ। इस बीच मुझे महसूस ही नहीं हुआ की भारी चिमटे को देर तक बजाने से मेरे हाथ में पहले छाले पड़े और फिर उसमें से खून भी रिसा।
हालांकि मैं परचम लहराने वाला ईसाई नहीं हूँ, लेकिन मेरा जन्म एक ईसाई परिवार में हुआ है, इसलिए मैं ईसाई ही कहलाता हूँ। कभी कभी भूले-भटके चर्च भी चला जाता हूं।
हाँ, जगन्नाथ मंदिर या कोणार्क मंदिर से लेकर दक्षिण भारत का मीनाक्षी मंदिर या दिल्ली का हनुमान मंदिर, शायद ही कोई ऐसा मंदिर होगा, जहाँ मैं नहीं गया।
धर्म नहीं पूछा गया
मुझसे कभी किसी ने मेरा धर्म नहीं पूछा, न ही मैंने कभी किसी मंदिर या गुरुद्वारे में जाने से परहेज़ किया। लेकिन हाल की घटनाओं के बाद और रिबेरो साहिब को पढ़ने के बाद अजीब लगा। आखिर अब क्यों इस बात पर पर ज़ोर दिया जा रहा है कि भारत के ईसाई अपनी भारतीयता साबित करें?
अपने आप को हिंदू धर्म का ठेकेदार कहने वाले ये कुछ लोग तब कहाँ थे जब नौजवान एयरफ़ोर्स पायलट डेन्ज़िल कीलर और उनके भाई ट्रेवर 1965 के युद्ध में जान की बाज़ी लगाकर पाकिस्तान के एक के बाद एक सेबर जेट गिरा रहे थे?।
जब सेनाध्यक्ष सुनीत रोड्रिग्ज़ और वायु सेना प्रमुख ला फांते भारतीय फ़ौज की अगुआई कर रहे थे, तब क्यों नहीं किसी ने उनको घर वापसी के लिए मजबूर किया था?
और जब 1982 के दिल्ली एशियन गेम्स में नेहरू स्टेडियम में 75 हज़ार दर्शकों के सामने चार्ल्स बोरोमियो ने गोल्ड मेडल जीत कर तिरंगा लेकर स्टेडियम का चक्कर लगाया तो सब ठीक था?
जेटली और आडवाणी बताएँ?
25 साल तक टेनिस कोर्ट पर देश के लिए पसीना बहा कर एक के बाद एक ख़िताब जीत कर लिएंडर पेस ने जो भारत को सम्मान दिलाया, क्या वो इसलिए था कि उनकी धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचाई जाए?
अपने दिल पर हाथ रखकर अरुण जेटली बताएं कि क्या दिल्ली के सेंट ज़ेवियर स्कूल में किसी ने उन्हें ईसाई बनाने की कोशिश की थी?
या फिर लाल कृष्ण अडवाणी को कराची के सेंट पैट्रिक स्कूल में ईसाई क्यों नहीं बनाया गया था? न जाने कितने स्कूल ईसाई संस्थाओं से जुड़े नहीं होने के बावजूद अपने नाम के आगे 'सेंट' शब्द जोड़ देते हैं ताकि स्कूल चल सके। आज ये स्कूल भी असमंजस में हैं, 'सेंट' शब्द जोड़े तो धर्म के ठेकेदारों के पत्थरों का डर, अगर हटा दें तो एडमिशन में कमी। करें तो करें क्या?
ग़ैर-ईसाई जलाते हैं मोमबत्ती
दिल्ली में गोल डाक खाना सेक्रेड हार्ट गिरजा घर के बाहर रोज़ मदर मेरी के बुत के सामने सैकड़ों लोग मोमबत्ती जलाते हैं। इनमें ज़्यादातर पास के बंगला साहिब गुरुद्वारे में आने वाले लोग और टैक्सी और ऑटो ड्राइवर होते हैं। वे बड़ी श्रद्धा से वहां आते हैं। क्या उन्हें कभी किसी ने ईसाई बनाने की कोशिश की है?
लेकिन आज दिल्ली में और बाहर भी एक अलग माहौल है। ईसाई समुदाय के लोगों को थोड़ा डर है और उसके साथ अफ़सोस भी कि उनको इससे गुज़रना पड़ रहा है।
न जाने कब कौन पत्थर मार दे!
दिल्ली के कई गिरजाघर शाम को खुले रहते हैं और लोग बिना किसी रोकटोक और भेदभाव के अंदर जा कर कुछ अपने ही ढंग से भगवान को याद करते हैं। इनमें अधिकतर हिंदू होते हैं।
लेकिन आजकल इन गिरजाघरों के पादरियों और चौकीदारों को फिक्र रहती है। ना जाने कब कौन पत्थर मार कर कह दे कि वहां इन लोगों का धर्म परिवर्तन हो रहा है।