एक वक्त ऐसा भी था जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ में अपने लोगों के साथ जन्मदिन मनाया करते थे। चुटकी व ठिठोली के बीच दिन बीत जाता था। लखनऊ में उनके अपने तो आज भी हैं और चाहते हैं कि फिर वही दिन लौट आए। लेकिन अटल का स्वास्थ्य ऐसा करने की इजाजत नहीं देता।
जन्मदिन तो इस बार भी मनाया जा रहा है परंतु अटल की गैरहाजिरी के साथ। सिर्फ समर्थकों को ही नहीं, विरोधियों को भी अटल जैसे नेता की पहले जैसी सक्रियता न होना साल रही है। इनके दिल से भी सिर्फ यही निकलता है, ‘अटल जैसा बनना आसान नहीं।’
पूर्व मंत्री व वरिष्ठ कांग्रेस नेता अम्मार रिजवी कहते हैं कि अटल जी प्रधानमंत्री थे तब मुझसे कई लोगों ने कहा कि लंदन के लिए लखनऊ से सीधे कोई फ्लाइट न होने से बड़ी दिक्कत होती है। इसलिए आप अटल जी से कहकर इसका कुछ इंतजाम करा दीजिए।
मैने प्रधानमंत्री कार्यालय फोन कर उनसे मिलने के लिए समय मांगा। कुछ समय बाद ही उधर से अटल जी लाइन पर। मुझे दिल्ली बुलाया। मिले। हालचाल जाना। आने का मकसद भी पूछा। मैंने उन्हें प्रार्थना पत्र दे दिया। इसके तुरंत बाद उन्होंने आदेश दे दिया और कुछ ही दिनों में लखनऊ से सुबह एक कनेक्टिंग उड़ान लंदन के लिए शुरू हो गई। लेकिन जैसे ही वाजपेयी प्रधानमंत्री पद से हटे, यह सेवा बंद कर दी गई।
अटल जैसे लोग विरले होते हैं। मैं कांग्रेस में और वह भाजपा में थे। फिर भी कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं उनके दल का नहीं हूं। उन जैसे नेता अब हैं कहां। मेरी कामना है कि ऐसे नेता को लंबी उम्र दे। उनके ठहाके फिर सुनाई दें।
पूर्व मंत्री और वरिष्ठ समाजवादी नेता भगवती सिंह बताते हैं कि परिचय तो काफी पुराना था। पर, कुछ ऐसे मौके मेरे जीवन में आए जिन्हें मैं कभी भुला नहीं सकता। एक बार संयोग से लखनऊ आते हुए मेरी और अटल जी की सीट हवाई जहाज में अगल-बगल हो गई। वह आए और मुझे पहले से बैठे देखा तो बोल पड़े, ‘अरे वाह! हम साथ-साथ चलेंगे।’
सार्वजनिक जीवन से लेकर घर-परिवार तक हालचाल लिया। फिर संयोग से उनकी आंख झपक गई। मैने सोचा कि मेरे धक्के से उनकी नींद टूट न जाए तो उठकर पीछे की सीट पर जाकर बैठ गया। जागने पर उन्होंने मुझे हाथ पकड़कर अपने पास बैठाया। इतना बड़ा नेता और इतनी विनम्रता।
एक और वाकया। एक दिन वह बख्शी का तालाब क्षेत्र में स्थित चंद्रिका देवी मंदिर पर पहुंचे। वहां हुए काम को देखा तो पूछा किसने कराया। लोगों ने मेरा नाम लिया। उन्होंने दिल खोलकर मेरी प्रशंसा की। ऐसे नेता तो बिरले ही होते हैं। वह श्रद्धेय थे और आज भी हैं। ईश्वर उन्हें शतायु करे।
पूर्व एमएलसी व महापौर दाऊजी गुप्त का कहना है कि उनसे जुड़े एक नहीं अनेक प्रसंग हैं। मेरा और उनका साथ तो किशोरावस्था से रहा। याद नहीं कितनी बार अटल के साथ-साथ चाट खाई होगी। मेरी और उनकी राजनीतिक विचारधारा शुरू से ही अलग रही। पर, दोस्ती में बाधा नहीं खड़ी हुई।
कुछ समय पहले मैं उनसे मिलने भी गया था। वही बचपन वाला स्नेह मिला। वह बड़े नेता हो गए। प्रधानमंत्री बन गए। मैं उनके खिलाफ लखनऊ से लोकसभा का चुनाव लड़ा। मैं जब लखनऊ का महापौर था तो उन्होंने पदेन सदस्य के नाते मेरे खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर भी किए।
पर, जब भी मुझे देश या विदेश में कहीं मिले तो नाम लेकर पुकारा, ‘दाऊ जी कैसे हो।’ वह सिर्फ पद व कद से ही बड़े नेता नहीं हैं बल्कि बहुत बड़ा दिल रखने वाले भी हैं। ‘यथा नाम तथा गुणै:’ शायद इसी वजह अटल देश की राजनीति में ऐसा ‘अटल मुकाम’ बन गए। ईश्वर उन्हें स्वस्थ करे।