नरेंद्र मोदी के भाजपा के नए चेहरे के तौर पर अवतरित होने के बाद संगठन के प्रचार तंत्र में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की उपेक्षा से पार्टी नेतृत्व परेशान है।
आखिरकार पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को इस मामले में दखल देना पड़ा है। राजनाथ ने दिल्ली इकाई को फटकार लगाने के साथ ही सभी प्रदेश इकाइयों को पार्टी के प्रचार तंत्र में अटल-आडवाणी को नहीं भूलने की नसीहत दी है।
राजनाथ को यह दखल इसलिए देना पड़ा, क्योंकि गुटबाजी से जूझ रही भाजपा की दिल्ली इकाई ने विधानसभा चुनाव में अटल-आडवाणी को लगभग भुला ही दिया था।
मध्य प्रदेश में भी होर्डिंगों में अकेले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ही दिख रहे हैं, अटल-आडवाणी को कहीं जगह नहीं दी गई। दिल्ली में तो पार्टी के होर्डिंग ही नहीं, बल्कि पोस्टर-बैनरों से भी ये वरिष्ठ नेता नदारद हैं।
हद तो तब हो गई जब पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में मोदी की फोटो तो प्रमुखता से लगा दी गई, लेकिन अटल-आडवाणी को जगह नहीं मिली।
इससे नाराज राजनाथ ने प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल व मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार डॉ. हर्षवर्धन से कड़ी नाराजगी जताते हुए इसका कवर बदलने को कहा। इसके बाद घोषणापत्र का कवर बदला गया और तब अटल-आडवाणी को जगह मिल पाई।
मामला यहीं तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में भी भाजपा के चुनाव प्रचार तंत्र में भी राष्ट्रीय नेतृत्व को कम ही जगह मिल पाई। राजस्थान में भी लगभग यही हाल है। जबकि भाजपा में श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं. दीनदयाल उपाध्याय के बाद अटल-आडवाणी ही पार्टी का चेहरा रहे हैं।
इसका प्रमाण यह है कि लंबे समय से खराब स्वास्थ्य के बावजूद वाजपेयी को सम्मान देने के लिए भाजपा सभी चुनावों में अपने स्टार प्रचारकों की सूची में उनका नाम शामिल करती है।
पार्टी के संसदीय बोर्ड के सदस्यों में भी उनका नाम शामिल है। बहरहाल, भाजपा नेतृत्व ने अब सभी प्रदेश इकाइयों से दो टूक कह दिया है कि अटल-आडवाणी को पार्टी के प्रचार तंत्र में पहले की तरह प्रमुखता से जगह मिलनी चाहिए।