राजनीति में बहुत सोच समझ कर कदम उठाने होते हैं। ऊंचे आर्दश और नैतिकता, समाज बदलने की बातें मंचों तक रह जाती हैं। लेकिन जब बात वोट पर आती है, तो फिर पुराने नुस्खों पर ही चलना है।
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अन्ना के आंदोलन से निकली आम पार्टी भले ही सियासत और देश को बदलने की बात करते रहे लेकिन वोट लेने के लिए उसे भी उन सब तिकड़मों को करना पड़ रहा है जो दूसरे राजनीतिक दल अपनाते रहे हैं।
मसलन बनारस जाकर सबसे पहले शहर काजी से मिलने गए। यानी शहर काजी को प्रभावित कर लिया तो मुस्लिम वोट अपनी जेब में। वह राजनीति को बदलने की बात कर रहे थे, तो यही लग रहा था कि शायद वह लुभावने तौर तरीकों के बजाए सीधे-सीधे मतदाताओं से अपनी बात कहेंगे। क्योंकि यह पार्टी दूसरों से अलग है। लेकिन वह केवल शहर काजी से मिलने ही नहीं पहुंचे, बल्कि उन्होंने इस अवसर के लिए खास टोपी पहनी।
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इस टोपी में हिंदी के बजाय उर्दू में लिखा था। लेकिन केवल उर्दू वाली टोपी से तो काम नहीं चलेगा। हिंदुओं की नाराजगी बढ़ सकती है। इसलिए बांटने के लिए ताबड़तोड़ दो तरह की टोपियां बनाई गई है।
इसलिए हिंदु बहुल इलाकों में हिंदी में लिखी टोपियां और मुस्लिम इलाकों में उर्दू में लिखी टोपियां बंट रही है। आप के सितारे थोड़ा गड़बड़ाए हुए हैं इसलिए बहुत ध्यान से टोपियां बांटी जाएंगी। कहीं एक की टोपी दूसरे में न पहुंच जाए। आखिर चुनाव जीतना है।
अमर और राज
राजनीति क्या न कराए। कभी सपा में अमर सिंह के वर्चस्व में राज बब्बर अपने को कमजोर पा रहे थे। राज बब्बर को लगा कि सपा में उनका उपयोग हो रहा है मगर अमर सिंह बहुत बारीकी से उनके पर कुतर रहे हैं। नोकझोंक हुई तकरार हुई। उस समय नेताजी के मन में अमर सिंह छाए हुए थे। बड़े-बड़े किनारे कर दिए गए थे, फिर राज बब्बर क्या चीज थे? मतभेद यहां तक बढ़ गए कि राज बब्बर को पार्टी से विदाई लेनी पड़ी। मुलायम सिंह ने भी मनाया नहीं, न इसकी जरूरत समझी।
राज बब्बर ने कांग्रेस में आकर कभी मुलायम सिंह के लिए सीधी टिप्पणी तो नहीं की लेकिन बताते रहे कि सपा अपने ऊसूलों से भटक गई है। राज बब्बर और अमर सिंह के संबंध तनावपूर्ण रहे। राज बब्बर ने सपा नेता और सपाइयों को चुनौती भी खास तरीके से दी। मुलायम सिंह की बहू डिंपल के खिलाफ चुनाव मे उतरे और जीत हासिल की।
मुलायम सिंह की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा आहत हुई थी। जिन अमर सिंह के साथ तनावपूर्ण रिश्तों के चलते राज बब्बर अलग हुए, अब उन्हीं के लिए राज बब्बर मंच पर चढ़े और लोगों से वोट की अपील की। फतेहपुर सीकरी में अमर सिंह आरएलडी कांग्रेस गठबंधन के संयुक्त प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं। इसलिए राज बब्बर को सहयोगी दल के नाते चुनाव प्रचार के लिए जाना पड़ा।
भले मन में पुरानी कडुआहट रही हो, पर मंच में तल्खी नहीं दिखी। राज बब्बर फिल्मी अदाओं में मुस्कराते रहे। अमर सिंह के लिए मंच पर चढ़ना जरूरी था। आखिर उनकी गाजियाबाद की सीट पर भी आरएलडी का समर्थन चाहिए था। राजनीति में कुछ चीजें आपसी समझौतों पर होती है।
वक्त का फेर है कि जिन अमर सिंह के कारण राज बब्बर को सपा से निकलना पड़ा, आज वो अमर सिंह भी सपा से बाहर निकाले जा चुके हैं। और जिन अमर सिंह के कारण राज बब्बर को पार्टी छोड़नी पड़ी थी, उन्हीं अमर सिंह के लिए राज बब्बर को उनके प्रचार में जाना पड़ा।
मोदी की वेस्ती
केजरीवाल का ध्यान टोपी पर है तो मोदी भी पहनावे पर खूब गौर करते हैं। दक्षिण भारत में मतदाताओं को अपने प्रभाव में लाने के लिए रजनीकांत से उनकी मुलाकात को बड़ा अहम बताया जा रहा है। सीधे रजनीकांत ने समर्थन की बात तो नहीं कही लेकिन उन्होंने मोदी की प्रशंसा कर दी है।
मोदी को और क्या चाहिए था। तमिल सिने दर्शकों के लिए रजनीकांत की अपनी बहुत बड़ी जगह है। ऐसे सुपर स्टार से मिलने के लिए जाते हुए मोदी को कुछ न कुछ खास तो करना ही था।
नारियल का पानी पीते हुए फोटो से भी शायद बात नहीं जमती। मोदी को यही सलाह मिली कि रजनीकांत से मिलने जाएं तो सफेद लुंगी पहन कर जाए। सलाह उपयोगी लगी और नरेंद्र मोदी इसी पोशाक में रजनीकांत के घर पर गए।
क्या कर सकते हैं तिवारीजी?
एनडी तिवारी पर किसी का ध्यान जाए या ना जाए पर कांग्रेसी जरूर गौर कर रहे हैं। तिवारीजी इन दिनों लोगों से कुछ ज्यादा मिल-जुल रहे हैं। खासकर नैनीताल के आसपास वह कभी यहां कभी वहां घूमने निकल पड़ते हैं। सुगबुगाहट कई तरह से है। पहले वह अपने बेटे के लिए इस सीट पर टिकट मांग रहे थे। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी मिले। आखिर कांग्रेस का टिकट बंटा पर वह तिवारीजी के लड़के रोहित के लिए नहीं था। अब तरह-तरह के कयास लग रहे हैं।
कोई कह रहा है कि तिवारीजी स्वयं चुनाव लड़ सकते हैं। और चुनाव लड़ने का मन बना लेंगे तो समाजवादी पार्टी मदद करने के लिए या अपने टिकट पर लड़ाने के लिए तैयार है। वैसे भी मुलायम सिंह तिवारी से अपनी एक गलती का प्रायश्चित करना चाहते हैं। बताते हैं कि जिस चुनाव में पराजित होने से तिवारीजी के हाथ से प्रधानमंत्री पद रह गया, उसकी वजह समाजवादी पार्टी ही थी।
उस समय सपा का उम्मीदवार न लड़ा होता तो तिवारी चुनाव जीत जाते। फिर प्रधानमंत्री पद के लिए उनका नाम सबसे ऊपर होता। मुलायम सिंह को इस बात का मलाल रहा और उन्होंने तिवारी से अपने प्रत्याशी को लड़ाना एक भूल माना। कहा तो यह भी जा रहा था कि तिवारी हरिद्वार में भी दांव आजमा सकते हैं। पर सियासी हलकों में यही कहा जा रहा है कि वह चर्चा में जरूर बने हैं। पर चुनाव शायद ही लड़ें। बस वह किसी तरह रोहित को राजनीति के मंच पर लाने की कोशिश कर रहे हैं।
मथुरा में तो तीन हेमा चुनाव लड़ रही हैं पर महासमुंद में दस चंदूलाल चुनाव लड़ रहे हैं। पता नहीं कितने जतन से दस चंदूलाल तलाशे गए हैं। भाजपा कह रही है कि उनके वोटरों को गुमराह करने के लिए दस चंदूलाल मैदान में लाए गए हैं।
भाजपा प्रत्याशी चंदूलाल साहू के मुकाबले में नौ और चंदूलाल मैदान में योजना के साथ उतारे गए हैं। कांग्रेस कह रही है कि क्या चंदूलाल नाम का एक ही व्यक्ति हो सकता है। क्या भाजपा ने इस नाम पर पेटेंट किया है?
अब प्रचार में भजपा यह जरूर बता रही है कि चंदूलाल कमल वाले। या फिर प्रचार को सीधे मोदी के कमल से जोड़ा गया है। पर एक साथ दस चंदूलाल चुनाव में खड़े होने से थोड़ा माहौल हास परिहास का हो गया है। इस सीट पर कांग्रेस के दिग्गज अजित जोगी चुनाव लड़ रहे हैं। कहने वाले कह रहे हैं कि जोगी कुछ अलग न करें तो फिर क्या बात है।