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'कांग्रेस जो रात में करती है, भाजपा वो दिन में'

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बुकर पुरस्कार विजेता और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति रॉय ने कहा है कि पुरस्कार वापसी को लेकर अगर उन पर कॉपीकैट - नकल करने, का आरोप लगता है तो वो कॉपीकैट बनकर खुश हैं।
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उन्होंने कहा कि संघ या बीजेपी की विचारधारा के विरोध करने का दूसरों के साथ उन्हें मौका मिला और इसी कारण उन्होंने पुरस्कार लौटाया।

बीबीसी हिंदी से बातचीत में अरुंधति ने कहा कि जब 2005 में कांग्रेस ने उन्हें पुरस्कार दिया था तो उन्होंने कहा था कि वो तो उनके खिलाफ लिखती हैं तो क्या चुप कराने के लिए पुरस्कार दिया जा रहा है और पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया था।

रॉय ने कहा कि कांग्रेस दरअसल भाजपा के खिलाफ नहीं है, बल्कि कांग्रेस जो रात में करती है, भाजपा दिन में करती है। बीबीसी हिंदी के रेडियो एडिटर राजेश जोशी ने अरुंधति रॉय के साथ बातचीत की।
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'आप मुझे वोट दो, मेरे लिए तालियाँ बजाओ'

आपको जो पुरस्कार मिला था उसे आपने वापस कर लिया है, आपको अवार्ड वापस करने में इतना वक्त क्यों लगा?

मैंने अपना अवार्ड इसलिए वापस किया क्योंकि ये देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा कि बहुत सालों के बाद ये दिखाई दे रहा है कि लेखक, फिल्मकार जो ज्यादातर राजनीति से दूर रहते हैं, वो सामने आ रहे हैं। एक वजह ये भी थी कि 2005 मे जब कांग्रेस का राज था, तब मैंने साहित्य अकादमी पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया था, तो लोग उस वाकये का हवाला देकर इन लेखकों को निशाना बना रहे थे कि अरुंधति ने तो अवार्ड लिया ही नहीं था। आप लोगों ने तब लिया और अब वापस कर रहे हैं।

मैं उन लोगों के साथ खडी होना चाहती थी। मैं बहुत खुश हूं कि पहले इतने सारे लोगों ने अपने पुरस्कार लौटाए और अब जाकर मैंने किया। वरना पहले बहुत बार ऐसा मैं पहले करती रही हूँ।

एक जनतांत्रिक देश में जिस व्यक्ति को 336 सीटें जनता ने दी हैं, उसके खिलाफ यदि 50 लेखक या कुछ कलाकार अपने पुरस्कार लौटा रहे हैं तो इस संतुलन को देखते हुए आप लोग अल्पमत में नहीं हैं?

लेखकों का काम बहुमत में रहना नहीं है। मैं अगर अकेली भी हूँ तब भी मैं जो सोचती हूं वो लिखूँगी, भले ही सब लोग मेरे खिलाफ हों। हम नेता नहीं हैं। मैं ये नहीं कह रही हूँ कि आप मुझे वोट दो, मेरे लिए तालियाँ बजाओ।

मैं खिलाफ बहुत लिख चुकी हूं

जब उदय प्रकाश ने लगभग दो महीने अपना पुरस्कार लौटाया, तब लेखकों की अंतर्रात्मा क्यों नहीं नहीं जगी। जो पुरस्कार लौटा रहे हैं इनमें से ज्यादातर पहले से ही आरएसएस और मोदी की राजनीति के खिलाफ रहे हैं। उनका रुख तो पहले से ही साफ था, इसमें नया क्या है?

मैं कॉपीकैट बनकर खुश हूँ। शायद इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है। बीजेपी या आरएसएस के खिलाफ होना कोई खराब बात नहीं है। मैं नहीं मानती कि कांग्रेस वास्तव में बीजेपी के खिलाफ है।

कांग्रेस जो रात में करती है, बीजेपी दिन में करती है।मान लो कोई संघ की विचारधारा के खिलाफ है और मुझे दूसरों के साथ एक मौका मिला है, विरोध दिखाने का तो मैं तो दिखाऊँगी।

मोदी या संघ के पक्षधरों का तर्क है कि ये पहली बार नहीं हो रहा है। दलितों को जलाया जाता है, 84 के दंगे हुए तब आप लोग कहाँ थे?

जो पहले से राजनीतिक परिदृश्य में नहीं थे, वे अपना जवाब खुद देंगे। लेकिन जहाँ तक मेरा सवाल है, तो मैं कह सकती हूँ कि जब से मैंने लिखना शुरू किया है तब से कांग्रेस के खिलाफ बहुत लिख चुकी हूँ।

मुझे आप कांग्रेस-भाजपा बहस में नहीं घसीट सकते। जब 2005 में कांग्रेस ने मुझे पुरस्कार दिया तो मैंने कहा कि मैं आप लोगों के खिलाफ लिखती हूँ तो क्या मुझे चुप कराने के लिए पुरस्कार दे रहे हैं, मैंने पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया था।

'जिम्मेदारी तो आप पर आएगी'

15 अगस्त को मोदी ने लाल किले से कहा कि सांप्रदायिकता को 10 साल के लिए ताले में बंद कर दीजिए। कम से कम अपनी बात तो उन्होंने कही, फिर जिम्मेदारी उन पर क्यों आती है?

जब आप प्रधानमंत्री हैं तो जिम्मेदारी तो आप पर आएगी। अभी दो ताकतें काम कर रही हैं। विदेश से जो निवेश लाना चाहते हैं, वो कहते हैं कि माहौल सुधार लीजिए।

लेकिन जो आपको वोट देते हैं वो कुछ अलग सोच रहे हैं। ऐसे में जो आप कहते हैं और जो करते हैं, दोनों अलग-अलग हो जाते हैं। दादरी की घटना हुई तो प्रधानमंत्री चुप रहे थे।

तो क्या आप ये कह रही हैं कि अगर आरएसएस हिंदू राष्ट्र का एजेंडा लागू कर रहा है, प्रधानमंत्री उसके साथ हैं या उनके बीच कुछ तनाव या खिंचाव है?

मेरे ख्याल से इसमें और तनाव आने वाला है। हालाँकि मैं इस मामले में एक्सपर्ट तो नहीं हूँ। लेकिन इतना तो तय है कि जिन्होंने उनको वोट दिया है और जो उद्योगपति उन्हें इस पद पर लाए हैं, उन दोनों में बहुत तनाव है।

लेकिन इतना हल्ला नहीं मचा!

ऐसा क्यों है कि जब दलितों पर अत्याचार होता है तो सिर्फ दलित संगठन बयान देते हैं। जब मुसलमानों पर अत्याचार होता है तो तथाकथित सेक्युलर ब्रिगेड उठ खडी होती है। क्या आपको नहीं लगता है कि दलितों पर किया जाने वाला अत्याचार, कुछ कम अत्याचार, और मुसलमानों पर अत्याचार अधिक माना जाता है?

बिल्कुल सही बात है। मैं ये मानती हूँ। मैंने इस पर काफी कुछ लिखा भी है। जब कोई ऊंची जाति का हिंदू मारा जाता है, कोई दलित मारा जाता है और मुसलमान मारा जाता है तो अलग-अलग बातें होती हैं। हाल में ही दलितों के खिलाफ बहुत कुछ हुआ है, लेकिन इतना हल्ला नहीं मचा।

तब आपने पुरस्कार लौटाने का फैसला क्यों नहीं किया?

नहीं...नहीं। पुरस्कार लौटाने से क्या होता है। मैंने दलितों के बारे में भी लिखा है। और मुझे लगता है कि इस मुद्दे पर भी।

इस मान्यता में क्या कोई सच्चाई है?

कुछ दलित विद्वानों का मानना है कि 1947 में अगर हर मुसलमान पाकिस्तान चला जाता तो दलित ही निशाना बनाते। इस मान्यता में क्या कोई सच्चाई है?
दलित तो अब भी निशाना बन रहे हैं। दलितों की समस्या को सिर्फ आरक्षण तक सीमित कर दिया गया है। दलितों का मामला सिर्फ नरसंहार तक नहीं है। जाति के बारे में सारी बहस सिर्फ चुनावों के समय होती है।

कोई भी इस बारे में गंभीर बहस नहीं करता।बिहार चुनाव जब तक है तब सभी जाति के विद्वान बन जाते हैं, जैसे ही चुनाव खत्म हो जाएगा, जाति पर कोई बात नहीं करेगा। दलित के बारे में बात नहीं करेंगे।

ये कोई नहीं पूछेगा कि उद्योगपति, सुप्रीम कोर्ट के जज, प्रोफेसर, एडिटर किस जाति के हैं? अखबार किस जाति के हाथ में हैं, पूँजी किसके पास है? जाति और पूँजी एक साथ मिलकर क्या बना है?


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लेखकों को सोच-समझकर लिखना पडेगा

जो रुख कलाकारों ने लिया है, ये क्या एक मजबूत बहुमत वाली सरकार को हिला पाएगी या ये बहस सिर्फ मजाक बनकर रह जाएगी?

जब किसी को चोट लगती है तभी तो गालियां निकलती हैं, तभी मजाक उडाया जाता है। ये बहुत बडी बात हुई है। सबको मालूम है। इससे आगे क्या होगा पता नहीं। अवार्ड लेना-देना बहुत बडी बात नहीं है मेरे लिए।

अवार्ड वापस करने से माहौल तो कम से कम सियासी बना है? आप क्या मानती हैं?

मुझे लगता है, आगे से कलाकारों, लेखकों को सोच-समझकर लिखना पडेगा, स्टैंड लेना पडेगा। अवार्ड लेना या मना करना बहुत बडी बात हो जाएगी।
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