पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में आर्सेनिक युक्त पेयजल नवजात बच्चों पर कहर बरपा रहा है। पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ने से हाल के दिनों में यहां बच्चों की मानसिक और शारीरिक विकलांगता तेजी से बढ़ी है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की टीम ने इलाके का मुआयना कर इस बाबत अपनी अध्ययन रिपोर्ट तैयार की है।
रिपोर्ट में बच्चों के मानसिक विकृति की वजह से आर्सेनिक युक्त जल को बताया गया है। टीम ने पाया कि राज्य में केवल मुर्शिदाबाद जिले में ही मानसिक रोग से ग्रस्त बच्चों की संख्या ज्यादा है। इस इलाके में सर्वाधिक बाल आश्रम चलाए जा रहे हैं, जो कि मानसिक रूप से कमजोर बच्चों की देखरेख और पढ़ाई कराते हैं।
जब आयोग की टीम ने इस बारे में तहकीकात किया तो स्थानीय लोगों ने बाल विवाह और गर्भवती महिलाओं के खानपान में पोषक तत्वों की कमी को बच्चों की मानसिक कमजोरी का कारण बताया। पर आयोग की टीम ने गहन छानबीन में पाया कि यहां पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ गई है। जिसका असर बच्चों की मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर हो रहा है।
रिपोर्ट में इस बाबत राज्य सरकार से शुद्ध पेयजल के लिए मुर्शिदाबाद जिले में जल्द से जल्द फिल्टर मशीन लगाने की सिफारिश की गई है। आयोग के सदस्य विनोद कुमार टिकू ने बताया कि आईआईटी खड़गपुर ने आर्सेनिक युक्त पानी को छानने के लिए देसी फिल्टर तैयार किया है। इसके जरिए इलाके के पेयजल को शुद्ध किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि देसी फिल्टर की जानकारी मुर्शिदाबाद जिला प्रशासन को दी गई है। एक फिल्टर की कीमत तीन से चार हजार रुपये है। एनसीपीसीआर ने जिला प्रशासन से इलाके में बच्चों की मानसिक कमजोरी का अध्ययन कराने की सिफारिश की है।
इसके अलावा मानव तस्करी रोकने संबंधी एक रोडमैप, बाल आश्रमों में सफाई, रहने और खानपान की व्यवस्था में सुधार की सिफारिश भी रिपोर्ट में की गई है। आयोग ने यह रिपोर्ट केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को भी सौंपा है।