अदालत ने एक मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट कर दिया कि जघन्य अपराध में सजा से बचने के लिए किसी भी अभियुक्त के नाबालिग होने के तर्क की चाल को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने लूटपाट के आरोपी के नाबालिग होने के तर्क को खारिज कर दिया।
रोहिणी स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामनी लाऊ की अदालत ने अपने फैसले में आरोपी रणजीत उर्फ बिहारी के उस तर्क को खारिज कर दिया कि घटना के समय मई- 2011 में वह नाबालिग था।
अदालत ने कहा कि सभी तथ्यों से स्पष्ट है कि घटना के समय वह 20 साल का था और उसके दादा ने स्कूल में दाखिले के समय उसकी आयु बिना किसी दस्तावेज के काफी कम दर्ज करवाई थी।
ऐसे में स्कूल के प्रमाणपत्र को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा अभियुक्त 20 अन्य जघन्य अपराधों में लिप्त रहा है और उसने वर्ष-2009 में विवाह किया। इतना ही नहीं वोटर आई कार्ड के अनुसार भी वह बालिग है।
अदालत ने कहा, ‘यह अजीब बात है कि जब विवाह व वोट देने की बात आती है तो वह बालिग बन जाता है, लेकिन जब अपराध की बात आती है तो वह सजा से बचने के लिए नाबालिग होने का राग अलापने लगता है।’
अदालत ने जांच अधिकारी व जेल अधीक्षक को इस फैसले की एक-एक प्रति रिकार्ड में रखने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा, ‘यदि अभियुक्त किसी अन्य अदालत में विचाराधीन मुकदमे में इसी प्रकार का तर्क देकर राहत प्राप्त करने का प्रयास करे, तो उस अदालत में इस फैसले की प्रति पेश की जाए, ताकि वह राहत पाने में सफल न हो सके।’
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के हाल ही के फैसले का हवाला देते हुए कहा, ‘अदालत की ड्यूटी है कि नाबालिग होने के तर्क के आधार पर कोई अभियुक्त सजा से न बच सके।’
अभियुक्त ने अदालत में स्कूल का प्रमाण पत्र पेश कर तर्क रखा था कि उसका जन्म पांच अक्तूबर 1994 को हुआ था। अदालत ने जांच अधिकारी को स्कूल, ग्राम पंचायत व अन्य प्रकार से जांच करने का निर्देश दिया था।
जांच अधिकारी ने अदालत को बताया कि स्कूल में मौखिक रूप से जन्म तिथि बताने के आधार पर दाखिला दिया गया था।
वहीं, पिता व पंचायत रजिस्टर में उसका जन्म 1988 में और वोटर आई कार्ड के अनुसार 1987 में बताया गया था।