चुनाव की बेला क्या न करा दे। अब देखिए कांग्रेसी सांसद संजय निरुपम और प्रिया दत्त में दोस्ती हो गई। लड़ाई बहुत पुरानी थी। प्रिया अपने पापा सुनील दत्त की राजनीतिक विरासत को हाथ से नहीं गंवाना चाहती थी। इतना तो उन्होंने जाना ही था कि पापा की आंखों में संजय निरूपम खटकते रहे हैं। लिहाजा प्रिया और संजय में भी खूब तकरार हुई।
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मगर दिल्ली की आप पार्टी का करिश्मा कहिए कि संजय निरूपम और प्रिया दत्त एक साथ एक मंच पर आ गए। दोस्ती हो गई। एक दूसरे की प्रशंसा में कसीदे भी पढ़े गए। आप सोचेंगे कि भला दोनों दोस्त हो गए तो आप पार्टी को क्रेडिट देने की क्या बात है।
पर हुआ यही है आप की हवा का असर है कि इन दिनों ईमानदारी और लोगों के दुख-दर्द को दूर करने के हुनर में कोई पीछे नहीं दिखना चाहता। फिर चाहे अपनी ही पार्टी को क्यों न कोसना पड़े। फिर यह भी कि अगर सरकार लोगों के हित में फैसला ले तो क्रेडिट दूसरों को क्यों जाने दें। लिहाजा, चुनाव की बेला करीब आते ही दोनों को लगा कि अब बैर ठीक नहीं। बिजली की दर से जनता को कष्ट हो रहा है, एक साथ आकर इसका विरोध किया जाए। संजय निरूपम की अगुवाई में मोर्चा निकाल और उस हूजूम में प्रिया भी साथ थी। मुंबई के लोगो ने देखा कि किस तरह दो सांसद अपनी ही सरकार का विरोध कर रहे हैं। मगर ऐसा विरोध जिसमें हाईकमान से झिड़की नहीं, प्रशसा मिलनी है।
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केजरीवाल की टोपी
अरविंद केजरीवाल की टोपी का खास महत्व है। आखिर इसी टोपी ने राजनीति को नया तेवर दे दिया है। टोपी पर लिखा रहता है कि मैं आम आदमी हूं। अरविंद केजरीवाल आम आदमी की समस्याओं को लेकर जूझ रहे हैं, और उन्होंने अपनी राजनीति का ध्येय भी यही बताया तो टोपी पर मैं हूं आम आदमी लिखने से भला किसे ऐतराज होगा। मगर बात इससे आगे की है।
अब उनकी टोपी कुछ बदली हुई है। डिजाइन या रंग आकार से नहीं। इसमें थोड़ा बदलाव यही है कि अब मैं हूं आम आदमी केवल हिंदी में ही नहीं उर्दू, इंग्लिश में भी लिखा है।
संभव है कि आने वाले समय में टोपी में गुरुमुखी, गुजराती मराठी में भी मैं हूं आम आदमी लिखा मिल जाए। यानी पूरे भारत को अपनी टोपी से प्रसन्न करने की बात है। आखिर इसकी क्या जरूरत थी। क्या टोपी में उर्दू, अंग्रेजी में लिखने का संदेश यह नहीं कि सबको लुभाना है। आखिर टोपी में मैं हूं आम आदमी लिखने से क्या कुछ कमी रह जाती है जो उसे दूसरी भाषाओं में भी लिखा गया है। पर आप वालों तक यह बात कौन पहुंचाए कि फिर आप की टोपी और दूसरों की टोपी में क्या फर्क रह जाएगा।
बेदी की भलमनसाहत
भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान बिशन सिंह बेदी ने अपने समय में अपनी आर्मर गेंदों से दुनिया के अच्छे अच्छे बल्लेवाजों को चकमा दिया है। बाएं हाथ का यह स्पिनर सुबह से शाम तक कई ओवर फेंक लेता था पर थकता नहीं था। गजब की कला। पर क्रिकेट में वह हमेशा खास ही बने रहे। यहां तक कि अपने स्तर का उन्हें हमेशा गुरुर रहा।
आने वाले स्पिनर उनकी एक प्रशंसा पाने को तरस गए पर क्या मजाल बेदी साहब के श्रीमुख से कभी मनिंदर, हरभजन के लिए शाबाशी का कोई शब्द निकला हो।
इन भारतीय स्पिनरों की बात छोड़िए, मुरलीधरऩ को भी वह जब तब स्पिन के नाज नखरे समझाते रहे। क्रिकेट से संन्यास लिया तो पुराने आयुर्वेद के आचार्यों की तरह अपने ज्ञान को अपने तक ही रखा। उसे बांटा नहीं। यानी खास बने रहे। पर अब शायद उनका अंतर्मन जागा है कि आम हो जाना चाहिए। इसी कोशिश में वह एकदिन आम आदमी की तरह टहलते हुए कोशांबी तक आ गए। सचमुच का आम आदमी भी उन्हें हैरत से देख रहा था।
ब्राह्मण कुमार विश्वास
कुमार विश्वास के भाषण मुग्ध करते हैं। मंच पर खड़े होकर बोलना शुरू करते हैं तो श्रोता उत्सुक हो जाते हैं कुछ न कुछ लुभावना जरूर कहेंगे। आखिर मंच और कैमरा उनके लिए नई बात नहीं है।
कुछ नया है तो उनका राजनीतिक दल। गजब का विश्वास। वह अमेठी के युवराज को हराने के लिए चल पड़े हैं। एक आम सभा की कर ली है। और कह रहे हैं कि चुनाव तक यहीं डटे रहेंगे। यानी अमेठी की रंगबिरंगी हालत से लोगों को खूब परिचित कराएंगे।
उनका परिचय पहले एक कवि, आम आदमी पार्टी के नेता के तौर पर था। पर अमेठी में उनका परिचय विस्तार पा गया। वहां जाकर वह युवराज से लड़ने वाले एक नौकर हो गए। साथ ही ऐसे आम व्यक्ति जो उपनिषद पढ़ा हो, ब्राह्णमण हो। ब्राह्रमण बताने से अमेठी की अंदरूनी राजनीति में क्या संदेश जा सकता है, इसकी समीक्षा राजनीति के पंडित जरूर कर रहे होंगे। फिलहाल चर्चा उनके कारों के काफिले को लेकर भी है। आम आदमी इस तरह अमेठी में दस्तक देगा, तो खासमखास का क्या हाल होगा।
अचानक किरण बेदी भावुक हुईं और उन्होंने राष्ट्र को बताया कि नरेंद्र मोदी की स्पीच उन्हें बहुत अच्छी लगती है। उनका मानना है कि नरेंद्र मोदी जो कहते हैं वह दिल से कहते हैं। कहने वाले कहते हैं कि ऑफर तो आप पार्टी ने भी दिया था। यहां तक कि चुनाव से पहले उनके पास आप पार्टी का दिल्ली में नेतृत्व करने का प्रस्ताव था। पर यह दो कारणों से संभव नहीं था। एक तो किरण बेदी को आप की इस सफलता का अनुमान न रहा हो।
दूसरा यही बताया जाता है कि किरण बेदी कुछ भी कहें लेकिन भाजपा के लिए उनका झुकाव कहीं न कहीं दिखता रहा। भला समाजवादी पैटर्न पर राजनीति में उतरे आप से दूसरे नेताओं से उनका मिजाज राजनीति के पटल पर मेल कहां खाता। खैर न किरण बेदी को आप में जाना था, न वह गईं। पर कहीं न कहीं सफर तो होगा ही।
इसलिए इन हालातों में मोदी की प्रशंसा ज्यादा माकूल लगती है। अब राजनीतिक हलकों में यही सुगबुगाहट है कि मैडम या तो अमृतसर से लड़ सकती हैं या फिर दिल्ली से कमल खिलाने का प्रयास कर सकती हैं। लेकिन यह अभी कयास है। उनकी तरह से स्वीकृति नहीं। हां मोदी की तारीफ करके उन्होंने भाजपा को कुछ संकेत तो दे ही दिए हैं। इन संकेतों को भाजपा को समझना है।