मैं खुद को सहज बनाए रखने की भरसक कोशिश कर रहा था।
दरअसल अंदर कमरे में जिस व्यक्ति का इंटरव्यू चल रहा था, उसके बाद मेरा ही
नंबर था। और मैं जानता था कि आने वाले कुछ मिनट मेरे भविष्य को निर्धारित
करेंगे।
वर्षों की आईएएस की तैयारी ने ये तो सिखा दिया था कि तनाव को मुस्कराते हुए झेला कैसे जाता है, मगर यह तो तनाव का चरम था। यह मेरे लिए अंतिम मौका था। फिर मैं हिंदी माध्यम का था, और मुझे बता दिया गया था कि बोर्ड के अध्यक्ष दक्षिण भारतीय हैं, जिन्हें हिंदी नहीं आती।
'जाइए, सर' साक्षात्कार कक्ष के दरबान ने शाही अंदाज से एक हाथ से दरवाजा खोलते हुए मुझसे कहा। एक बार मैंने अपने एक दोस्त से कहा था, ''अगर आईएएस नहीं बन पाए, तो हिम्मत नहीं हारेंगे, और ज्यादा मेहनत करेंगे। साला कुछ तो हाथ आएगा।''
मैंने यही बात मन में दोहराई, और साथ में सनातन काल से हिम्मत बांधने के लिए कही जा रही पंक्तियां, ''जो होगा, देखा जाएगा।''
क्या हुआ इंटरव्यू में
बोर्ड में अध्यक्ष समेत कुल पांच लोग। मैंने सभी का अभिवादन किया, और अनुमति मिलने पर कुर्सी पर बैठ गया। पांच जोड़ी आंखे मुझे देख रही थीं, जबकि मेरी कोशिश बस यही थी कि मेरे भीतर जो बवंडर मचा है, वह मेरे चेहरे पर न झलके।
'आर यू कर्म्फटेबल' अध्यक्ष ने पूछा। मैंने कहा, 'बिल्कुल सर'। फिर शुरू हुआ सवालों का दौर। बोर्ड के अध्यक्ष और फिर बारी-बारी सभी सदस्यों ने मुझसे सवाल किए। मैंने सभी सवालों के जवाब हिंदी में दिए। जब अध्यक्ष महोदय को किसी शब्द के अर्थ को समझने में दिक्कत होती थी, तो उन्हें समझाने में बोर्ड के दूसरे सदस्य मेरी मदद कर देते थे।
मेरा इंटरव्यू तकरीबन 28 मिनट तक चला, और इस दौरान बोर्ड के सदस्यों का व्यवहार बिल्कुल दोस्ताना था। बोर्ड के अध्यक्ष ने पहले ही मुझसे कह दिया था, कि आप जिस भाषा में कर्म्फटेबल हों, उसी में जवाब दें।
यह इंटरव्यू देने का मेरा दूसरा मौका था। मगर इस बार भी इंटरव्यू में अच्छे अंक मिलने के बावजूद आईएएस की परीक्षा में कामयाबी नहीं मिली। अपनी नाकामयाबी का विश्लेषण करने पर मैं कह सकता हूं कि हिंदी माध्यम का होना इसकी बड़ी वजह थी।
क्या है सी-सैट
हिंदी माध्यम से अपनी तैयारी की शुरुआत करके दो बार आईएएस के इंटरव्यू तक सफर करने के बाद मैं कह सकता हूं कि हिंदीभाषियों को आईएएस जैसी परीक्षा में जो परेशानियां आती हैं, उनसे मैं अच्छे से वाकिफ हूं। और सरकार ने सी-सैट को लेकर अंग्रेजी के अंक मेरिट में न जुड़ने का जो फैसला किया है, उससे हिंदी माध्यम के उम्मीदवारों को हो रही असंतुष्टि को भी मैं महसूस कर सकता हूं।
दरअसल, 2011 से सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के पैटर्न में बदलाव लाया गया। इससे पहले इस परीक्षा में दो पेपर होते थे, जिनमें से एक पेपर सामान्य अध्ययन का, और दूसरा चुने गए वैकल्पिक विषय का होता था। मगर अब प्रारंभिक परीक्षा में वैकल्पिक विषय के पेपर की जगह सीसैट (सिविल सर्विसेज एप्टिट्यूड टेस्ट) का पेपर जोड़ दिया गया। इस पेपर में कांप्रिहेंशन, संचार, डिसीजन मेकिंग, गणित और रीजनिंग आदि के सवाल पूछे जाते हैं।
सी-सैट को लाने का उद्देश्य यह है सिविल सेवा परीक्षा को बदलते समय के अनुरूप बनाया जाए। और इस उद्देश्य से कोई इंकार भी नहीं है, मगर हिंदी भाषी उम्मीदवारों को लगता है कि सी-सैट के इस पेपर के नाम पर उनक साथ भेद-भाव हो रहा है। और इसकी वजहें भी हैं।
हिंदी माध्यम के उम्मीदवारों की शिकायतें
संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी ने प्रारंभिक परीक्षा के सामान्य अध्ययन के पेपर के लिए न्यूनतम क्वालीफाइंग अंक 200 में से 30 रखे हैं, जबकि सी-सैट वाले पेपर में 200 में से 70 निर्धारित किए हैं। क्या इसकी वजह यह नहीं मानी जानी चाहिए कि यह हिंदीभाषियों को देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा में आने से रोकने की साजिश है ?
सी-सैट के इस विरोध के पीछे आंकड़े भी हैं। जहां 2011 से पहले तक 45 से 48 प्रतिशत अंक पर टॉप होता है, वहीं अब महज 33 फीसदी अंक लाने वाला छात्र टॉप कर रहा है। दरअसल हो यह रहा है कि अब एसएससी और बैंकिंग की तैयारी करने वाले आईएएस की परीक्षा में भी बैठने लगे हैं। ये वे छात्र होते हैं जिनकी गणित और रीजनिंग तो अच्छी होती है, मगर मुख्य परीक्षा, जो कि निबंधात्मक शैली की होती है, में ये विद्यार्थी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते।
शिकायत है कि सी-सैट प्रणाली ने सिविल सेवा परीक्षा की वैचारिक गुणवत्ता घटाई है। एक बार 2000 अंकों की मुख्य परीक्षा में मेरे 958 अंक आए थे, मगर मुझे इंटरव्यू का बुलावा नहीं आया, वहीं आज महज 570 अंकों पर सामान्य वर्ग के छात्र को इंटरव्यू देने का मौका मिल रहा है।
हिंदीभाषियों का सिमटता दायरा
2010 तक प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण करने वालों में से हिंदीभाषियों का प्रतिशत तकरीबन 45 तक हुआ करता था, जो अब घटकर महज 10 प्रतिशत पर सिमट गया है। वहीं, अंतिम चयन में जहां पहले 25-30 प्रतिशत विद्यार्थी हिंदी माध्यम के हुआ करते थे, वह आंकड़ा अब दो फीसदी पर आ गया है।
गौरतलब है कि सी-सैट के पेपर में कुल 80 सवाल पूछे जाते हैं। इनमें से तकरीबन 26 कांप्रिहेंशन, 8 अंग्रेजी, प्रशासनिक अभिरुचि के 6 और गणित व रीजनिंग के 40 सवाल होते हैं। इनमें अंग्रेजी के 8 सवालों से हिंदीभाषियों को दिक्कत नहीं होती, उनकी समस्या तो कांप्रिहेंशन के वे सवाल हैं, जिनका सरकारी अनुवाद इतना जटिल होता है, मतलब समझने में पसीने छूट जाते हैं। हिंदी के जिन अभ्यर्थियों की अंग्रेजी थोड़ी ठीक होती है, वह कांप्रिहेंशन को अंग्रेजी में भी पढ़ते हैं, मगर इसमें जो समय लगता है, उससे होने वाले नुकसान का क्या।
एक बड़ा सवाल सी-सैट के पाठ्यक्रम को लेकर भी है। सी-सैट के पाठ्यक्रम में मौजूद सभी हिस्सों से बराबर सवाल क्यों नहीं पूछे जाते। आखिर इतनी बड़ी संख्या में कांप्रिहेंशन के सवाल पूछे जाने की क्या वजह हो सकती है। फिर गणित और रीजनिंग के सवालों के जरिये भावी आईएएस अधिकारी की किस क्षमता की जांच की जा रही है ?
सरकार के फैसले के मायने
कहा जा सकता है कि सरकार ने अंग्रेजी कांप्रिहेंशन के सवालों के अंक मेरिट में न जोड़ने का फैसला लेकर सही दिशा में कदम बढ़ाया है। मगर यह कुछ ऐसा ही है जैसे किसी भूखे को एक-चौथाई रोटी पकड़ा दी गई हो, जबकि उसे छह रोटियों की भूख हो।
दरअसल 200 अंकों के सी-सैट पेपर में तकरीबन 100 अंकों का कांप्रिहेंशन आता है। इसमें से अंग्रेजी कांप्रिहेंशन के कुल बीस अंक के आठ सवाल होते हैं। सरकार ने इन बीस अंकों पर फैसला तो सुना दिया, मगर उन 80 अंको का क्या, जो गलत अनुवाद के चलते हिंदीभाषियों के लिए अबूझ पहेली बन जाते हैं।
फिर जब 'स्टील प्लांट' का अनुवाद 'इस्पात का पौधा' हो, तो हिंदीभाषियों की यह शिकायत जायज भी लगती है।
सी-सैट के बाद भी हैं मुश्किलें
अपने जीवन के सबसे अहम वर्ष आईएएस की तैयारी को देने के बाद, मैं हिंदी भाषी विद्यार्थियों की मनःस्थिति अच्छी तरह से समझ सकता हूं। उनकी शिकायतें बिल्कुल जायज हैं, मगर फिर भी मैं निजी तौर पर कहीं न कहीं महसूस करता हूं किआईएएस की परीक्षा में हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों के सामने बड़ी बाधा सी-सैट पेपर नहीं है। और फिर अगर सी-सैट के पेपर में अनुवाद वाला दोष ठीक कर दिया जाए, या पूरा सी-सैट पेपर ही हट जाए, तो क्या हिंदी भाषियों की मुश्किलें खत्म हो जाएंगी ?
चलो मान लिया कि प्रारंभिक परीक्षा पास कर ली, फिर मुख्य परीक्षा का क्या ? सवाल उठता है कि सी-सैट को लेकर चल रहे इस पूरे आंदोलन को इतने सीमित ढंग से क्यों देखा जा रहा है। मुझे लगता है कि हिंदीभाषी उम्मीदवार भी अपनी बात को ठीक ढंग से नहीं रख पाए।
मुख्य परीक्षा में एक पेपर हिंदी का और एक अंग्रेजी भाषा का भी पेपर होता है। इन पेपरों के अंक तो मेरिट में नहीं जुड़ते, मगर इनमें आयोग द्वारा निर्धारित न्यूनतम अंक पाना जरूरी होता है। जो उम्मीदवार इनमें निर्धारित अंक नहीं ला पाते, उनकी बाकी कॉपियां भी चेक नहीं होती। कहने को तो अंग्रेजी का यह पेपर दसवीं के स्तर का होता है, मगर इसे पास करना भी तमाम हिंदीभाषी उम्मीदवारों के लिए टेढ़ी खीर बन जाता है। ऐसे में लगता तो यही है कि प्रारंभिक परीक्षा बेशक पास कर लें, मगर अंग्रेजी सुधारे बिना, आईएएस बनने का सपना तो पूरा होने से रहा।
सोच बदलने की जरूरत
2011 से पहले आईएएस की मुख्य परीक्षा में हिंदीभाषी उम्मीदवारों को वैकल्पिक विषय का सहारा था। तब कुल 2000 अंकों की परीक्षा में 1200 अंक तो वैकल्पिक विषयों के ही होते थे। जिनमें अभ्यर्थी का प्रदर्शन कुछ हद तक उसके रटने की क्षमता पर भी निर्भर करता था। फिर हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों की बचपन से शिक्षा कुछ इस तरह की होती है कि वे रटने में उस्ताद होते हैं।
अब मुख्य परीक्षा कुल 1750 अंक की है, जिसमें से सामान्य अध्ययन के 250-250 अंकों के चार पेपर यानी कुल 1000 अंक और वैकल्पिक विषय के 250-250 नंबर के दो पेपर यानी कुल 500 अंक। तो हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों के सामने इस मुख्य परीक्षा को पार करने की भी बड़ी चुनौती है।
आईएएस की असल परीक्षा तो मुख्य परीक्षा ही है। अपनी पूरी तैयारी के दौरान मैंने यह महसूस किया कि जो चीज हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के लिए आईएएस की तैयारी को सबसे ज्यादा मुश्किल बनाती है, वह यह हिंदी में स्तरीय किताबों का न मिल पाना। फिर हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के लिए इंटरनेट का उतना फायदा उठा पाना भी मुमकिन नहीं हो पाता; क्योंकि यहां भी अंग्रेजी में तंग होना, उनके लिए मुश्किल पैदा कर देता है।
हिंदीभाषियों के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है। मगर यह स्वीकार करने और फिर इसका समाधान ढूंढने के लिए यह भी जरूरी है कि हिंदी माध्यम के विद्यार्थी अपनी सोच को बदलें।