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हिंदुत्व को धार न दें तो क्या करें नरेंद्र मोदी?

Mon, 09 Nov 2015 12:05 PM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय
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यदि नरेंद्र मोदी पाटलिपुत्र में मिली हार से उबरना चाहते हैं तो उनके पास दो विकल्प हैं- या तो एक बार फिर बेपरवाह हिंदू हृदय सम्राट बनकर संघ परिवार के एजेंडे को आगे बढ़ाएं या फिर खुद को अटल बिहारी वाजपेयी की तरह नेहरूवादी के रूप में गढ़ें।
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अगर मोदी इनमें से कोई भी रास्ता नहीं अपनाते हैं तो वो बेअसर प्रधानमंत्री बनकर रह जाएंगे और एक समय आएगा जब पार्टी के अंदर से उन्हें हटाने को लेकर आवाज़ें उठने लगेंगी और अगले आम चुनाव में कोई और नेता पार्टी का नेतृत्व कर रहा होगा।

फिलहाल पार्टी और सरकार में मोदी को चुनौती दी जाएगी- भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और उनके मुख्य सहयोगी अरुण जेटली पर निशाना साधकर। शाह के लिए बतौर अध्यक्ष एक पूरा कार्यकाल हासिल करना और 2019 के संसदीय चुनावों में पार्टी के चुनावी अभियान का नेतृत्व करना मुश्किल होगा।
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हो सकता है कि पार्टी में मोदी के विरोधी लोकसभा चुनावों से पहले अपने किसी साथी को अध्यक्ष बनाने की कोशिश करें। इसी तरह, जेटली पार्टी और संघ परिवार में अपने मित्रों की सूची लंबी करने में कामयाब नहीं हो सके हैं। इस कारण मोदी पर पार्टी में जेटली की भूमिका को कम करने का दबाव होगा।

2015 में ब्रांड मोदी पर लड़े गए दो चुनावों में भाजपा को शिकस्त झेलनी पड़ी है। इससे पहले फ़रवरी में दिल्ली विधानसभा चुनावों में हुई पार्टी की हार को अपवाद के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन बिहार के नतीजों का असर पड़ा और देश के दूसरे राज्यों पर इसका असर हो सकता है।
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क्या दूसरे चुनावों में भी पड़ेगा असर?

बिहार में शिकस्त का सबसे पहला असर असम और पश्चिम बंगाल में भाजपा के अभियान पर पड़ेगा। इन दोनों राज्यों में से असम में पार्टी की नज़र बहुमत हासिल करने पर थी, जबकि पश्चिम बंगाल में पार्टी दूसरे दलों को कड़ी टक्कर देने की उम्मीद कर रही थी।

लेकिन बिहार की पराजय से राजनीतिक समीकरण बदलेंगे और असम में सत्ता हासिल करने के पार्टी के इरादों को झटका लगेगा। यही नहीं, इन नतीजों का असर 2017 में बिहार के पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों पर भी दिखाई देगा।

बिहार के नतीजों से उत्तर प्रदेश में भाजपा की चुनावी संभावनाओं को धक्का लगा है। इससे ये भी संभावना बनी है कि मोदी संघ परिवार में अपनी हैसियत कायम रखने के लिए आरएसएस से मोलभाव करें और ध्रुवीकरण की राजनीति पर आगे बढ़ते रहें।

उत्तर प्रदेश में भी भाजपा को विपक्ष से कड़ी टक्कर मिल सकती है। ऐसे में ध्रुवीकरण की रणनीति पार्टी के लिए वहाँ सबसे कारगर हो सकती है। इस झटके के बाद हो सकता है संघ इस राह पर कुछ समय तक न चले, लेकिन संघ इस राह को छोड़ने की गलती नहीं करेगा, आख़िरकार ये उसका मुख्य हथियार जो है।

अपने राजनीतिक करियर में मोदी को आज तक इससे अधिक शर्मिंदगी कभी नहीं झेलनी पड़ी है। वो इस पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं और इससे उबरने के लिए क्या रणनीति अपनाते हैं, ये देखने की बात होगी।

भाजपा और मोदी के सामने सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि उन्होंने ध्रुवीकरण की राजनीति का अपने सबसे बड़ा दांव चला, लेकिन ये कामयाब नहीं हो सका।और अधिक ध्रुवीकरण होने की स्थिति में ही शायद पार्टी को किसी तरह का फ़ायदा हो।

अगर मोदी अपनी मौजूदा स्थिति से हटकर मध्यम मार्ग पर चलने की इच्छा रखते हों तो उन्हें ये क़दम तुरंत उठाना होगा।मोदी के राजनीतिक करियर में वह ऐसे रास्ते पर चल रहे हैं जिस पर वो अब तक नहीं चल रहे थे, और इस राह पर वो कितनी चतुराई से चलेंगे ये देखने वाली बात होगी।

(नीलांजन मुखोपाध्याय 'नरेंद्र मोदीः दि मैन, दि टाइम' किताब के लेखक हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
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