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मिलिए, मोदी के धर्मपुत्र जीत बहादुर और उसके परिवार से

Thu, 07 Aug 2014 01:18 PM IST
विनोद राव, गोविंद साहनी/अमर उजाला, लोका गांव (नेपाल)
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मामूली परिवार में जन्मे जीत बहादुर का नाम आज नेपाल और भारत ही नहीं कई देशों के लोगों की जुबां पर है। जीत बहादुर इसे संयोग ही मानते हैं कि आज भारत की सबसे बड़ी हस्ती का हाथ उनके सिर पर है। इसीलिए जीत ने साफ कहा कि पढ़ाई पूरी करने के बाद मोदी जी जैसा निर्देश देंगे वही करुंगा।
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अमर उजाला की टीम मंगलवार को जब जीत के गांव पहुंची, तो वहां मेले जैसा माहौल था। भीड़ को देखते हुए नवलपरासी जिला प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए हैं। घर पर जीत की भाभी देउमाया शारूमगर मिलीं।

पूछने पर बताया कि भाई दशरथ, मां खगीसारा के साथ उद्योगपति विनोद चौधरी की फैक्ट्री पर गए हैं। वहीं पर जीत के परिवार से मुलाकात हुई।

जीत बहादुर ने सुनाई अपनी कहानी

जीत बहादुर ने बताया कि घर की परिस्थितियां ठीक नहीं थीं। पिता चूड़ामणि शारूमगर की मौत के बाद वर्ष 2006 में बड़े भाई दशरथ नौ साल की उम्र में मुझे दिल्ली ले गए। वहां उन्होंने एक चाय की दुकान पर काम करने के लिए लगा दिया। मन नहीं लगा तो दो दिन बाद भाई को बिना बताए घर जाने के लिए रेलवे स्टेशन पहुंच गया। वहां गोरखपुर की ट्रेन पकड़नी थी, लेकिन गलती से अहमदाबाद की ट्रेन पकड़ ली। अगले दिन अहमदाबाद पहुंचा तो अनजान जगह देखकर डर गया। आंखों से आंसू निकल आए। रोते देख एक महिला अपने साथ ले गईं।

रात भर उनके घर रहा। अगले दिन महिला ने नरेंद्र मोदी से बात की। तभी से उनके साथ हूं। अहमदाबाद से बीबीए अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रहे जीत का कहना है कि जैसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहेंगे, वैसा ही करूंगा। 10 अगस्त तक यहां रहने के बाद अहमदाबाद चला जाऊंगा।

गांव में स्कूल का है सपना
पहाड़ी क्षेत्र में बसा जीत बहादुर का गांव लोका काफी पिछड़ा है। न सड़कें हैं और न ही कोई विद्यालय। गांव में सिर्फ 20 लोगों का परिवार रहता है। अधिकतर घरों के लोग रोजी-रोटी कमाने बाहर गए हैं। कुछ घरों के बच्चे पढ़ने के लिए आठ किलोमीटर दूर कावासोती जाते हैं। जीत को भी गांव के पिछड़ेपन का दर्द है। उसका सपना गांव में एक विद्यालय खुलवाने का है ताकि बच्चों को पढ़ने के लिए दूर न जाना पड़े।
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नेपाल हुआ मोदीमय

जीत बहादुर की मां खगीसारा बेहद खुश हैं। उनका कहना है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों उपहार पाना सपने के सामान है। उन्होंने चार पैकेट में साड़ियां दी हैं, जिन्हें वह विशेष अवसर पर ही पहनेंगी।

जीत बहादुर के बड़े भाई दशरथ ने बताया कि मैं उसे दिल्ली में एक चाय की दुकान पर काम करने के लिए ले गया था। दूसरे दिन शाम को जब हालचाल लेने पहुंचा तो दुकानदार ने बताया कि वह तो काफी देर पहले ही यहां से चला गया। इसके बाद जीत को कई जगह तलाशा, लेकिन पता नहीं चला।

जीत बहादुर की बड़ी मां जुन माया ठाड़ा ने कहा कि जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी काठमांडू में भाषण दे रहे थे तो टेलीविजन पर पूरे गांव के लोग देख रहे थे। ऐसा लग रहा था कि नेपाल के देव तुल्य राजा वीरेंद्र वीर विक्रम शाह मोदी के रूप में नेपाली जनता को संबोधित कर रहे हों।

कावासोती निवासी शशिधर रेग्मी ने कहा कि भारत ही नहीं नेपाल भी मोदीमय हो गया है।
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