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सभी वर्गों के लोगों को शंकराचार्य बनाने की मांग उठी

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सनातन हिंदू धर्म में आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारो सर्वोच्च पीठों पर चारो वर्णों को समान अधिकार देने की नई मांग उठ रही है। एक तरफ जब देश के सबसे वरिष्ठ और बुजुर्ग शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने 24 अगस्त को छत्तीसगढ़ में साईं पूजा के मुद्दे पर धर्म संसद का अह्वान किया है, ठीक उसके दस दिन पहले साधू संतों के एक समूह ने सभी शंकराचार्यों को पत्र लिखकर मांग की है शंकराचार्य के पद के लिए ब्राह्मण होने की अनिवार्यता खत्म करके इसे हिंदू समाज के चारो वर्णों और महिलाओं के लिए भी खोला जाए। मांग है कि आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारो पीठों पर ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और दलित वर्णों को भी शंकराचार्य नियुक्त करने की परंपरा शुरु की जाए।
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चार पीठों में सिर्फ हो सकती है ब्राहमणों की नियुक्ति

गौरतलब है कि आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों श्रंगेरी, द्वारिका, पुरी और बद्रीनाथ में शंकराचार्य पद पर सिर्फ ब्राह्मण सन्यासी ही नियुक्त हो सकते हैं। यह परंपरा पिछले हजारों वर्षों से अनवरत चली आ रही है। पांचवी पीठ कांची कामकोटि जो बाद में स्थापित हुई, उसमें भी इसका ही पालन हो रहा है।

लेकिन हाल ही में उत्तर प्रदेश के संभल स्थित कल्कि धाम के पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम, स्वामी चक्रपाणि, महामंडलेश्वर स्वामी प्रबोधानंद, स्वामी कल्याण देव ने एक संयुक्त रूप से एक पत्र ज्योर्तिपीठ बद्रीनाथ उत्तराखंड और शारदा पीठ द्वारिका गुजरात केशंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद, गोवर्धन मठ जगन्नाथ पुरी उड़ीसा के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती और श्रंगेरी मठ कर्नाटक के शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ को पत्र लिखकर कहा है कि सनातन धर्म का मूल सिद्धांत जन्मना जाति व्यवस्था को नहीं मानता है।

हिंदू समाज का जातिवाद में बांट दिया

उसके मुताबिक जाति पांति पूछे नहिं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई। आदि शंकराचार्य ने भी देश की एकता को मजबूत करने के लिए चार दिशाओं में चार मठों की स्थापना की थी। इन संतों का यह भी कहना है कि आदि शंकराचार्य ने एक चांडाल(शूद्र) से अद्वैत का ज्ञान प्राप्त करके उसे गुरु की भी संज्ञा दी थी।

लेकिन कालांतर में जन्मान जातिवाद ने हिंदू समाज को जातीय खांचों में बांट दिया। इन दिनों शंकराचार्य पद भी समाज को अध्यात्म की राह दिखाने और समरसता लाने की जगह पद प्रतिष्ठा और राजनीतिक लाभ लेने का माध्यम बनकर रह गया है।

शंकराचार्य कांग्रेस के हैं करीबी

शंकराचार्यों से यह मांग करने वाले इन संतों में प्रमुख आचार्य प्रमोद कृष्णम कांग्रेस के टिकट से पिछले लोकसभा चुनाव में संभल से चुनाव लड़ चुके हैं। उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत कई नेताओं का करीबी भी माना जाता है। जबकि साईं पूजा पर एतराज जताने वाले शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती भी कांग्रेस के करीबी संतों में प्रमुख हैं। साईं मुद्दे पर भी प्रमोद कृष्णम शंकराचार्य से असहमत हैं। वहीं स्वामी चक्रपाणि एक समय आशाराम बापू के पक्ष में बोलने वालों में प्रमुख रहे हैं। इसलिए इस मुहिम के सियासी मायने भी निकाले जा सकते हैं।
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दिल्‍ली में होगी बैठक

अपने पत्र में इन्होंने शंकराचार्यों द्वारा संचालित गुरुकुलों में वेद अध्ययन शूद्रों एंव कन्यायों का प्रवेश वर्जित होने, किसी भी गैर ब्राह्मण और महिला को शंकराचार्य न बनाने और खान पान में जाति भेद करने के औचित्य पर प्रश्न उठाए हैं। पत्र में कहा गया है कि 22 अगस्त को सुबह 11 बजे एक बैठक दिल्ली में बैठक बुलाई गई है। तब तक सभी शंकराचार्य इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करें,अन्यथा इस मांग को लेकर देश व्यापी अभियान चलाया जाएगा।
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