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खेती पर मंडरा रहा है जलवायु परिवर्तन का संकट

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मौसम में आ रहे तेज बदलावों से देश की खेती पर संकट खड़ा हो गया है। बेमौसमी बारिश, सर्द मौसम में गरमी व गरम मौसम से सर्दी से फसलें चौपट हो रही हैं। इसका सीधा असर किसानों पर पड़ा है। वहीं, देश की अर्थव्यवस्था को बट्टा लग रहा है। इसका खुलासा सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की एक रिपोर्ट में हुआ है।
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जलवायु परिवर्तन से खेती पर पड़ने वाले असर से जुड़ी रिपोर्ट बृहस्पतिवार को नई दिल्ली में जारी की गई। रिपोर्ट बताती है कि अकेले मार्च महीने में हुई बारिश से रबी के उत्पादन में 1263.8 लाख टन की गिरावट आई। वहीं, कुल 20,453 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ। खास बात यह कि रिपोर्ट किसानों को राहत पहुंचाने वाले सिस्टम को खोखला मानती है।

सीएसई ने रिपोर्ट का आधार बीते मार्च महीने में हुई बारिश को बनाया गया है। मार्च महीना बीते पिछले 48 सालों में सबसे नम रहा। पूरे देश में 1-8 मार्च के बीच सामान्य से 197 फीसदी ज्यादा नमी रही। वहीं, पूरे मार्च महीने की बारिश सामान्य से दो गुनी थी।
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इसका सीधा असर रबी की फसल पर पड़ा। बेमौसमी बारिश से अकेले गेहूं की करीब 67 फीसदी फसल बर्बाद हो गई। वहीं, करीब 182.38 लाख हेक्टयर फसली क्षेत्र प्रभावित हुआ। रबी का उत्पादन अनुमान से 1263.8 लाख टन यानि 5.2 फीसदी कम रहा। रबी की फसल बर्बाद होने से देश को कुल 20,453 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

खेती पर लगातार बढ़ रहा है संकट

रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन का खतरा तेजी से बढ़ा है। लगातार तीसरे साल रबी की फसल इसकी चपेट में आई। लेकिन किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान 2015 में उठाना पड़ा। देश के 15 राज्यों में 182.3 लाख हेक्टेयर की फसल बर्बाद हुई। जबकि 2014 में छह राज्यों की 55 लाख हेक्टेयर व 2013 में पांच राज्यों की 3.5 लाख हेक्टेयर इसकी चपेट में आई।

दूसरा हिस्से में रिपोर्ट राहत व बचाव कार्य की पोल खोलती है। इसकी शुरुआत फसलों के नुकसान के आकलन से हो जाती है। इलाके का पटवारी फसल तैयार होने बाद दौरा करता है। और जो कुछ खुद देखता है उसी पर रिपोर्ट तैयार कर देता है। इससे नुकसान की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ पाती।

वहीं, जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार भी पलता है। इसके बाद जो मुआवजा मिलता है वो अगली फसल उपजाने में आने वाली लागत का बहुत छोटा सा हिस्सा होता है। दूसरी तरफ मुआवजे की राशि का भी कोई एक फार्मूला अभी नहीं बना है। राजस्थान सरकार 13,500 प्रति हेक्टेयर का मुआवजा देती है। जबकि उत्तर प्रदेश में 18,000 व दिल्ली में 50,000 हजार रुपये का मुआवजा मिलता है। इसके अलावा फसल बीमा सिस्टम भी लचर है। 2013-14 की रबी के मौसम में सिर्फ 10.31 फीसदी किसानों की फसलों का बीमा हो सका था।
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सबसे ज्यादा नुकसान में रहा उत्तर प्रदेश

मार्च की बेमौसम बारिश का सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश में दिखा। रबी के कुल क्षेत्र का करीब 80 फीसदी हिस्सा इसकी चपेट में आया। खास बात यह कि यूपी में सिर्फ 3.5 फीसदी फसलों का बीमा हुआ है। वहीं, उत्तराखंड व हरियाणा में यह आंकड़ा 70 फीसदी तक रहा। रिपोर्ट बताती है कि 15 राज्यों में करीब 33 फीसदी रबी की फसल खराब हुई।

इस मामले पर सीएसई के महानिदेशक सुनीता नारायण का कहना है कि फिलहाल हमें मौसम में तेज बदलाव दिखाई पड़ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन से किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है।

एक तरफ उसकी खेती बर्बाद हो रही है। वहीं, वह कर्ज के जाल भी फंसता जा रहा है। किसानों की मदद के लिए हमें तकनीक प्रधान बेहतर सिस्टम अपनाना होगा।
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