फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कार लोन से डेढ़ गुना महंगा है फसल पर कर्ज लेना

विज्ञापन
विज्ञापन
अगर आप नई कार या घर खरीदने के लिए कर्ज चाहते हैं तो आपका काम घर बैठे हो सकता है। अगर आप किसान हैं और फसल के लिए सरकारी बैंक से कर्ज चाहते हैं तो आपको वो पापड़ बेलने पड़ेंगे कि आप शायद दोबारा इस बारे में सोचेंगे भी नहीं।
विज्ञापन


सरकारी वादे एक तरफ लेकिन असलियत ये है कि कार के लिए कर्ज पर आप उस किसान से कम ब्याज देते हैं जो अपनी फसल पर कर्ज लेता है। इसका पता मुझे महाराष्ट्र में जालना के किसान जनार्दन पिंपले से मुलाकात के बाद चला। जनार्दन किसान के साथ ही डॉक्टर भी हैं और उन्होंने पहले कार खरीदने के लिए लोन लिया, फिर अपनी फसल पर। दोनों कर्ज हासिल करने के दौरान उन्हें पता चला कि बैंकों के सामने किसान और शहरी भारतीय एक समान नहीं।

डॉक्टर जनार्दन ने नवंबर 2012 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से कार के लिए ऋण लिया, जो उन्हें 10 फीसदी की दर पर मिला। उसी बैंक से 2014 में उन्होंने कम अवधि वाला कृषि ऋण लिया जो उन्हें छह महीने के लिए 13।15% प्रतिवर्ष की दर पर मिला। कार लोन का अप्रैल 2012 से नवंबर 2012 के बीच का बैंक स्टेटमेंट और एग्रीकल्चर लोन के लिए अप्रैल 2014 से जून 2014 के बीच का बैंक स्टेटमेंट देखकर कोई भी इसे आसानी से समझ सकता है।
विज्ञापन

सब्सिडी बेमानी

एक और खास बात, फसल पर कर्ज लेने के बाद उन्हें इंस्पेक्शन चार्ज के नाम पर एक बार 1,073 रुपए और फिर दूसरी बार 1,326 रुपए देने पड़े। इसके अलावा उनसे अकाउंट कीपिंग फीस भी वसूली गई। और यहीं तक बात नहीं रुकती। इंस्पेक्शन चार्जेज और अकाउंट कीपिंग फीस के पैसे पर भी उन्हें ब्याज चुकाना पड़ा।

जनार्दन के मुताबिक नो ड्यूज और डॉक्यूमेंटेशन चार्जेज के नाम पर ये खर्च तकरीबन 2000 रुपए और आया। चूंकि फसल के लोन पर बीमा जरूरी है तो इसके लिए उन्होंने 3000 रुपए और दिए। जनार्दन कहते हैं कि हॉर्टीकल्चर लोन पर 3 लाख 30 हजार का कर्ज लेने पर सरकार की ओर से एक लाख 32 हजार रुपए सब्सिडी मिलती है पर सवा 13 फीसदी की ब्याज देने पर ये सब्सिडी असल में बेमानी साबित होती है।

उनके मुताबिक, ''अगर आप शहरवासियों के 10 फीसदी और किसान के सवा 13 फीसदी के कर्ज के बीच अंतर की पड़ताल करेंगे तो सात साल के लोन का ब्याज सब्सिडी के भी ऊपर जा रहा है तो सरकार किसान पर कोई अहसान नहीं कर रही है। सवा तीन फीसदी उसे ज्यादा ब्याज का भुगतान करना पड़ रहा है। तो ये कैसी नीति है। पहले ज्यादा ब्याज मांगते हैं और फिर सब्सिडी देकर उन्हें उल्लू बनाते हैं। किसान क्यों नहीं खुदकुशी करेगा।’’
विज्ञापन

कानूनों का मकड़जाल

जनार्दन के मुताबिक होम या कार लोन लेते वक्त इंस्पेक्शन चार्ज नहीं लगाते हैं। मगर किसान की फसल के लिए मुआयना करते हैं। किस चीज का मुआयना करते हैं। क्रॉप लोन छह महीने का रहता है तो 1300-1400 रुपए लगाते हैं। वह कहते हैं कि अगर ये अतिरिक्त चार्जेज और उन पर ब्याज जोड़ लें तो कम अवधि वाले कर्ज के लिए उन्हें 16.5% तक ब्याज चुकाना पड़ा।

किसान को कम अवधि वाले फसल कर्ज पर आम शहरी के मुकाबले ज्यादा कागजी कार्रवाई करनी पड़ती है, ज्यादा ब्याज देना होता है, कई तरह के चार्ज देने पड़ते हैं, जो कई बार चक्रवृद्धि ब्याज की शक्ल ले लेते हैं। संवेदना यात्रा के संयोजक योगेंद्र यादव कहते हैं, ''कागज पर भारत सरकार की नीतियां बहुत अच्छी हैं। नीतियां कहती हैं कि किसान को सस्ती दर पर कर्ज दिया जाएगा। पहले तो किसान को आसानी से कर्जा मिलता नहीं। दूसरे किसान से वो-वो कागज मांगे जाते हैं जिनकी आवश्यकता ही नहीं।

मजबूर किसान से अगर कोई बैंक मैनेजर तरह-तरह के कागज मांगता है तो क्या किसान सुप्रीम कोर्ट जाएगा इसकी शिकायत करने के लिए। जब किसान बैंक में जाता है तो न तो वो बैंक के कानून जानता है न उससे अच्छा व्यवहार होता है और न इज्जत मिलती है।'' अकाल की दहलीज पर बैठे किसान के लिए कर्ज, ब्याज और कानूनों का मकड़जाल उस लाठी की तरह है जो उसकी चमड़ी तक छील लेता है और उसे दोबारा उठने नहीं देता। योगेंद्र यादव के नेतृत्व में हुई इस संवेदना यात्रा के दौरान मैं जिन राज्यों में पहुँचा वहां किसानों के लिए सरकारी साहूकार भी विलेन की तरह दिखे।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें