राजनीति में गांधी को जितना स्वीकार किया गया उतना ही खारिज। दुनिया के एक हिस्से ने गांधी का नमन किया तो दूसरे ने उनकी आलोचना की। गांधी भारतीय राजनीति के ऐसे चरित्र रहे, जिनके बयानों और भाषणों को अपने-अपने तरीकों से समझा गया।
अहिंसा के पुजारी गांधी की तस्वीरें उनके मंचों पर भी सजी, जिन्होंने हिंसा को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। सबकी खुशहाली की बात करने वाले गांधी उनके भाषणों का भी हिस्सा रहे, जिनकी विकास की दौड़ में आबादी का एक हिस्सा पीछे छूट गया।
66वीं पुण्यतिथि पर सरकारी विज्ञापनों में भी गांधी के कुछ ऐसे ही रंग दिखें। विभिन्न राज्य सरकारों और विभागों ने गांधी के संदेशों को अपने-अपने तरीके से इस्तेमाल किया। हर विज्ञापन में अपने-अपने गांधी हैं और उनकी बातों का अपना-अपना मतलब-
गांधी की पुण्यतिथि पर छत्तीसगढ़ पुलिस की कविता
नक्सल हिंसा की आग में छत्तीसगढ़ जल रहा है। महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर छत्तीसगढ़ पुलिस नक्सलवादियों से समर्पण की अपील की है। और इस अपील के लिए सहारा लिया गया है एक कविता का।
छत्तीसगढ़ पुलिस ने अखबारों में विज्ञापन के रूप में एक कविता प्रकाशित कराई है। कविता का शीर्षक है, 'बस्तर कर्म-भूमि की पुकार'।
माओवादियों का मकसद रहा है हिंसक संघर्षों के जरिए सत्ता हासिल करना। वे कहते हैं कि सत्ता बंदूक की नाल से निकलती हैं। पुलिस ने गांधी की पुण्यतिथि पर उनसे हिंसा छोड़ने और आम जनजीवन का हिस्सा बनने को कहा है।
'आप' सरकार ने पुण्यतिथि पर की स्वराज की बात
महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने उनके स्वराज के सपने को एक बार फिर याद किया है।
राज्य के सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञापन में गांधी की उस वक्तव्य को प्रकाशित किया गया है, जिसे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अक्सर दोहराते रहते हैं।
गांधी ने कहा था, 'सच्ची लोकशाही केंद्र में बैठे हुए 20 आदमी नहीं चला सकते। वह तो नीचे से हर एक गांव के लोगों द्वारा चलाई जानी चाहिए।
अरविंद केजरीवाल का भी कहना है कि वे सत्ता के दरवाजे सभी के लिए खोलना चाहते हैं। वे निर्णय का अधिकार मोहल्ला सभाओं को सौंपना चाहते हैं। हालांकि, केजरीवाल सरकार के पिछले एक महीनों में ये बात हकीकत होती दिखीं नहीं हैं।
सूचना प्रसारण मंत्रालय के विज्ञापन का अपना मतलब
महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर सूचना प्रसारण मंत्रालय ने रोचक विज्ञापन दिया है। सफेद पृष्ठभूमि पर गांधी का चश्मा और केवल दो शब्द- हे राम। ये शब्द भी अंग्रेजी में लिखे गए हैं।
गौरतलब है कि सूचना प्रसारण मंत्रालय की जिम्मा मनीष तिवारी के पास है और माना जा रहा है कि इस विज्ञापन के जरिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने की कोशिश की गई है।
गांधी के मुंह से निकले अंतिम शब्द 'हे राम' के जरिए मोदी की कट्टर सोच पर निशाना साधा गया है। ये विज्ञापन कांग्रेस की उस कैंपेन का हिस्सा लग रहा है, जिसके जरिए राहुल गांधी खुद को तोड़ने नहीं जोड़ने वाले नेता के रूप में प्रचारित कर रहे हैं।
गांधी के जरिए की गई स्वस्थ्य रहने की अपील
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने गांधी के जरिए लोगों से स्वस्थ्य रहने की अपील की है। मंत्रालय के विज्ञापन में गांधी के वक्तय को दिया गया है, जिसमें कहा गया है-स्वास्थ्य ही वास्तविक धन है ना कि सोने चांदी के टुकड़े।
स्वास्थ मंत्रालय ने महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर देश की जनता को संपूर्ण स्वास्थ्य की देखरेख की सुविधाएं मुहैया कराने की प्रतिबद्घता दोहराई है।
दिलचस्प बात ये है कि केंद्र में पिछले 10 सालों से यूपीए की सरकार है। ये सरकार देश के हर हिस्सों में एम्स जैसा उत्कृष्ट अस्पताल बनाने का दावा करती रही है। प्राथमिक स्तर पर चिकित्सा सेवा उपलब्ध करने का दावा करती रही है।
लेकिन विज्ञापन में स्वास्थ्य मंत्रालय अब भी प्रतिबद्घता ही जता रहा है। देश में स्वास्थ्य सेवाओं के हालात कैसे हैं, ये किसी से छिपा नहीं है।
विद्युत मंत्रालय ने की बिजली बचाने की अपील
महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर केंद्रीय विद्युत मंत्रालय ने अपने विज्ञापन के जरिए जनता से बिजली बचाने की अपील की है।
विद्युत मंत्रालय ने जो विज्ञापन दिया है, उसमें गांधी पृष्ठभूमि में उनका वक्तय है- वर्तमान में हम जो करते हैं, हमारा भविष्य उसी से तय होता है। विद्युत मंत्रालय ने विज्ञापन के जरिए देश को बिजली के क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाने की प्रतिबद्घता दोहराई है।
लेकिन यहां भी देश में बिजली के हालात को लेकर सवाल उठता है। बिजली क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए केंद्र सरकार दुनिया के कई देशों से परमाणु समझौते कर रही है। फिर भी बिजली के हालात में सुधार नहीं दिखता। ग्रामीण क्षेत्रों में तो हालात बहुत बुरे हैं।
वाणिज्य मंत्रालय ने की आर्थिक समानता की बात
गांधी ने कहा था कि मनुष्य की स्वतंत्रता के लिए जरूरी है आर्थिक समानता। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने बापू की पुण्यतिथि पर उनके इसी वक्तव्य को दोहराया है।
दिलचस्प बात ये है कि केंद्र की आर्थिक नीतियों से देश का एक हिस्सा हाशिये पर चला गया, जबकि गांधी हमेशा आर्थिक स्वतंत्रता की बात करते रहे।
केंद्र ने आर्थिक नीतियों में गांधी की आदर्शों का इस्तेमाल शायद ही कभी किया हो, लेकिन उनके वक्तव्यों को प्रयोग अपनी नीतियों को अमलीजामा पहनाने के लिए हमेशा किया।