रिटेल में एफडीआई पर जारी सियासी घमासान के बीच संसद में हंगामा हो रहा है। अधिकतर सांसद रिटेल में एफडीआई मुद्दे पर चर्चा कराने के पक्ष में हैं। अंतिम फैसला बहस पर लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ही करेंगी। विपक्ष भी इसके विरोध में कमर कसे है। क्या हैं विपक्ष के दावे और सरकार के तर्क आप भी डालिए एक नजरः-
रिटेल में एफडीआई के विरोध में दिए जाने वाले तर्क
-विरोधी कहते हैं कि ये विदेशी निवेश नौकरियां छीन लेगा। उनका तर्क है कि सुपरमार्केट छोटी किराना की दुकानों को निगल जाते हैं। अमेरिका और यूरोप में तो छोटी दुकानें खत्म ही हो चुकी हैं।
-जरूरत के सामान की सप्लाई पर विदेशी कंपनियों का अधिकार हो जाएगा। विदेशी कंपनियां दाम घटाकर लोगों को लुभाएंगी और उनका मुकाबला देसी कंपनियों के बस का नहीं होगा।
-बड़ी विदेशी कंपनियां बाजार का विस्तार नहीं करेंगी बल्कि मौजूदा बाजार पर ही काबिज हो जाएंगी। ऐसे में खुदरा बाजार से जुड़े 4 करोड़ लोगों पर इसका असर पड़ेगा।
-विदेशी कंपनियां अपने बाजार से ही सामान खरीदेंगी और ऐसे में घरेलू बाजार से नौकरी छिनेगी।
-इस मसले पर भारत और चीन की तुलना गलत है। चीन विदेशी कंपनियों का सबसे बड़ा सप्लायर है और भारत में रिटेल में एफडीआई होने पर चीन का ही सामान यहां बिकेगा।
-जिस सप्लाई चेन के बनने की बात सरकार खुद कर रही है वो काम भी उसी का है। अगर सरकार सप्लाई चेन दुरस्त कर दे तो किसानों को इसका फायदा बिना एफडीआई के ही मिलने लगेगा।
रिटेल में एफडीआई के समर्थन में दिए जाने वाले तर्क
-एफडीआई से अगले तीन साल में रिटेल सेक्टर में एक करोड़ नई नौकरियां मिलेंगी।
-किसानों को बिचौलियों से मुक्ति मिलेगी और अपने सामान की सही कीमत भी।
-विदेशी कंपनियां सप्लाई चेन सुधारेंगी तो खाद्य सामग्री का खराब होना थमेगा।
-सामान कम खराब होगा तो इससे खाद्य महंगाई भी सुधरेगी।
-विदेशी कंपनियों को कम से कम 30 फीसदी सामान भारतीय बाजार से ही लेना होगा। इससे देश में नई तकनीक आएगी। लोगों की आय बढ़ेगी और इसका फायदा औद्योगिक विकास दर को मिलेगा।
-देश की बड़ी कंपनियों को पहले ही रिटेल में आने की इजाजत है। चीन हो या फिर इंडोनेशिया जहां भी रिटेल में एफडीआई को मंजूरी दी गई वहां एग्रो-प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के दिन फिर गए।