वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की गोवा में भाजपा कार्यकारिणी की अहम बैठक में अनुपस्थिति से पार्टी में कोहराम मचा है। पार्टी नेता कसमें खाकर आडवाणी के वाकई बीमार होने की सफाई दे रहे हैं।
मगर दो दिनों से जारी विवाद के लगातार चरम पर पहुंचने के बावजूद स्वयं आडवाणी मुंह नहीं खोल रहे हैं। इससे साफ हो गया है कि आडवाणी बीमार नहीं बल्कि बेहद नाराज हैं।
इतने ज्यादा नाराज कि वर्ष 1980 में भाजपा और उससे पहले जनसंघ के गठन के बाद पहली बार उन्होंने कार्यकारिणी की बैठक से खुद को दूर कर लिया।
यहां तक कि आडवाणी ने तब भी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कि जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों ने उनके घर पर प्रदर्शन किया।
दरअसल भाजपा में मोदी समर्थकों ने आडवाणी की नाराजगी को अस्वस्थता से ढांपने की हर संभव कोशिश की। तो दूसरी ओर आडवाणी समर्थकों ने लगातार संदेश दिया कि आडवाणी बीमार नहीं बल्कि नाराज हैं।
शुक्रवार को खुद राजनाथ सिंह ने आडवाणी के अस्वस्थ होने और शनिवार को कार्यकारिणी की बैठक में शरीक होने का दावा किया था।
जब आडवाणी शनिवार को भी नहीं पहुंचे तो राजनाथ सहित पार्टी के कई अन्य नेताओं ने एक बार फिर से उनकी अस्वस्थता का हवाला दिया।
उधर आडवाणी ने विवाद के बावजूद कोई बयान न जारी कर यह संकेत देने की कोशिश की कि मीडिया में उनकी नाराजगी की अटकलें यूं ही नहीं हैं, बल्कि इनमें दम है।
इसके अतिरिक्त आडवाणी खेमे के शत्रुघ्न सिन्हा ने मुंबई में होने के बावजूद गोवा न जाकर और यशवंत सिन्हा ने ‘नमो-निया’ न होने के बावजूद गोवा से दूर रहकर इस आशय का संकेत दिया।
आडवाणी खेमे की मानी जाने वाली सुषमा स्वराज शुक्रवार को समय से पहले गोवा पहुंचने के बावजूद दो घंटे बाद बैठक में पहुंचीं।
मोदी विरोधी खेमे के जसवंत सिंह, उमा भारती, आदि ने बहानों के सहारे गोवा से दूरी बना कर आडवाणी के नाराज होने की पुष्टि की।
उत्तराखंड के दो बड़े भाजपा नेता बीसी खंडूरी और भगत सिंह कोश्यारी भी बैठक में नहीं गए हैं।
पार्टी सूत्रों का कहना है कि इसमें कोई दो राय नहीं कि आडवाणी मोदी को चुनाव अभियान समिति की कमान दिए जाने के विरोधी हैं। इसलिए जब उन्हें लगा कि पार्टी गोवा में इस आशय का घोषणा करने का मन बना चुकी है, तब अपनी नाराजगी जताने के लिए उन्होंने बैठक से दूरी बना ली।