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कालिया, एक ऐेसे शख्स जिन्होंने सबको अपना बना लिया

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हिन्दी कथा के सशक्त हस्ताक्षर रवींद्र कालिया और इलाहाबाद, दोनों एक दूसरे के पर्याय रहे हैं। वह भले ही जालंधर में जन्मे, पर इलाहाबाद की माटी में ऐसा रच-बस गए कि कहीं भी गए, कहीं भी रहे, उनका इलाहाबादीपन वफादार कनीज की तरह उनका दामन थामे हमेशा साथ रहा।
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बतौर रचनाकार उनकी रचनाओं में इलाहाबाद बार-बार शामिल होता रहा तो बतौर संपादक भी उन्होंने इलाहाबाद को हमेशा तरजीह दी।जिंदगी के नशे से लबरेज रहे कालिया ने जिस स्तर पर इलाहाबाद को अपनाया, इलाहाबाद ने भी उन्हें उसी स्तर पर मान दिया। चुन्नीलाल का छोला-भटूरा हो या शांति की कुल्फी या फिर तेलियरगंज में सब्जी खरीदना, उनका ठेठ इलाहाबादीपन कभी नहीं गया।

कई मौके ऐसे भी आए जब वह दूर दिल्ली में रहककर भी बाल कटवाने या डॉक्टर से मुलाकात के लिए यहां आए। दोस्तों की महफिलें जुटाने और रचनाकारों की मदद का नशा हमेशा उनके साथ रहा। बतौर लेखक वह कभी भी दायित्वबोध से दूर नहीं रहे। उन्होंने जिंदगी के आवेग और रागबोध को भी हमेशा बचाए रखा।
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कभी भी 'ग्लोरीफाई' नहीं किया

कहते थे, साहित्यकार के कर्म और व्यवहार का फर्क लेखन में भी नजर आएगा। साहित्य का काम जीवन से जोड़ना है, तोड़ना नहीं। यहां तक कि अपने पीने को न उन्होंने कभी छिपाया और न ही ‘ग्लोरीफाई’ किया। अपने लेखन में उन्होंने न कभी अपने को हीरो बनाया और न कभी अपने पर हंसने से चूके।

बिना लेखकीय लाइसेंस लिए बस, आम होकर खास जिंदगी का लुत्फ लेते रहे। इसीलिए उनकी आत्मकथा ‘गालिब छुटी शराब’ श्रेष्ठ आत्मकथाओं में सरलता से शामिल हो गई।वह एक अच्छे कथाकार, उपन्यासकार तो थे ही, अच्छे संपादक, अच्छे पति, अच्छे पुत्र, अच्छे पिता की भूमिकाओं में भी उतना ही सफल रहे।

लेखन के अतिरिक्त अच्छे ब्रांड की चीजें, अच्छा खाना, अच्छा संग-साथ, अच्छा सिनेमा उनकी कमजोरी रही। खास यह भी कि उनके लेखन और जीवन में कोई अंतर नहीं रहा। उन्होंने कभी टाइमटेबल बनाकर नहीं लिखा। कोई उपन्यास लिखने में उन्हें दस बरस लग गए तो दस दिनों में दस कहानियां लिखना भी उन्हीं के बूते की बात थी।

जिंदगी के हर सवाल साफगोई से दिया

तमाम लेखकों की तरह उन्होंने कभी कुछ नहीं छिपाया और पूरी साफगोई से जिंदगी के हर सवाल का जवाब देते रहे और पूरी जिंदादिली के साथ ही कूच कर गए कालिया, जिसने सबको अपना बना लिया।तकरीबन ग्यारह बरसों तक इलाहाबाद से बाहर रहने के बाद जून 2014 को जब पत्नी और सुपरिचित कथा लेखिका ममता कालिया के साथ वरिष्ठ कथाकार रवींद्र कालिया घर लौटे तो न सिर्फ कालिया दंपति बल्कि शहर के रचनाकारों को भी उनकी वापसी बहुत सुखद लगी थी।

ज्ञानपीठ और ज्ञानोदय की जिम्मेदारी से मुक्त होकर वह बड़े बेटे अनिरुद्ध से मिलने पहले मुंबई गए और वहां महीने भर से ज्यादा समय बिताकर छोटे बेटे प्रबुद्ध के पास इलाहाबाद आए थे। उत्सुकता से इलाहाबाद के मिजाज सहित प्रत्येक बड़े-छोटे रचनाकारों का हाल पूछा था। इस बीच लोकभारती गए तो सिविल लाइंस के नए-पुराने ठिकानों को भी देखा था।

घर वापसी पर रचनाकारों ने कुरेदा तो बोले, अपने शहर से दूर रहना तो शनि की साढ़े साती जैसा था, सो वापसी के साथ यह उतर गई। दोबारा फुरसत से अपनों के बीच बैठना, बोलना-बतियाना मेरे लिए संजीवनी से कम नहीं। पहले तीन वर्ष वागर्थ और फिर आठ बरस ज्ञानपीठ परिवार के साथ लेकिन इस बीच इलाहाबाद से कभी दूर रहा ही नहीं। इससे दूर रहा लेकिन भीतर इलाहाबाद हमेशा रहा।
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ज्ञानोदय की बढ़ गई बिक्री

कहा था, सभा-समारोह या डॉक्टरों से मिलने ही बाहर जाऊंगा, बाकी समय यहीं रहकर लिखना-पढ़ना होगा लेकिन जल्द ही शहर से दूर दूसरी जिम्मेदारियों से जुड़ गए। फिलहाल वह कांग्रेस कल्चर पर एक उपन्यास लिखने की तैयारी में थे। वरिष्ठ कथाकार रवींद्र कालिया के भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक और नया ज्ञानोदय के संपादन के दौरान ज्ञानपीठ शीर्ष पर पहुंचा।

ज्ञानपीठ को नए आयाम मिले। विविधतापूर्ण सामग्री से नया ज्ञानोदय समृद्ध हुआ। उन्होंने बहुत संवेदनशीलता से ज्ञानोदय को पाठकों से जोड़ा। इस दौरान उन्होंने सौ से ज्यादा नए लेखकों की पहली किताब छापी जो ज्ञानपीठ के लिए बड़ी उपलब्धि रही। उनके संपादन में पत्रिका को नई ऊंचाइयां मिलीं।

नया ज्ञानोदय महत्वपूर्ण पठनीय पत्रिका बनी और इसकी बिक्री कई गुना बढ़ी। इसे व्यावसायिक और साहित्यिक दोनों ही स्तर पर ऊंचाइयां मिलीं। उन्होंने क्लास और मास दोनों का ख्याल रखा, इसीलिए ज्ञानोदय से विशिष्ट और सामान्य दोनों ही वर्ग के पाठक जुड़े। उन्होंने समकालीन लेखन को तरजीह दी।
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