बलात्कारियों के लिए आजीवन कारावास की सजा की सिफारिश करने वाले जस्टिस जेएस वर्मा भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वे सदा हमारे दिलों में जीवित रहेंगे।
जस्टिस जेएस वर्मा भारत में यौन अपराधों से जुड़े कानूनों की समीक्षा करने वाली कमेटी के प्रमुख थे।
जस्टिस वर्मा 25 मार्च 1997 से 18 जनवरी 1998 को सेवानिवृत्ति तक भारत के 27वें प्रधान न्यायाधीश रहे थे। न्यायमूर्ति वर्मा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
उन्होंने जून 1989 में शीर्ष अदालत के न्यायाधीश बनने के बाद करीब 470 मामलों की सुनवाई की।
उन्होंने दिल्ली गैंगरेप में 16 दिसंबर 2012 को 23 वर्षीय एक पैरामेडिकल छात्रा के साथ बर्बर सामूहिक बलात्कार के बाद मजबूत बलात्कार विरोधी कानून के लिए सरकार को सिफारिशें देने वाली समिति की अध्यक्षता की थी।
सरकार ने इस समिति की ज्यादातर सिफारिशें मान ली थीं। इस समिति में गोपाल सुब्रमण्यम और लीला सेठ भी शामिल थे।
सरकार ने इन सिफारिशों के आधार पर अध्यादेश जारी किया था और इस साल बजट सत्र के पहले चरण में संसद में बलात्कार विरोधी कानून(एंटी रेप बिल) पारित हुआ था।
वर्मा वर्ष 1994 की उस नौ न्यायाधीशों की पीठ में शामिल थे जिसने कर्नाटक में संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लागू करने से जुड़े एसआर बोम्मई मामले पर सुनवाई की थी।
अपने फैसले में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि राष्ट्रपति के आदेश को संसद की मंजूरी के बाद ही लागू किया जा सकता है।
चर्चित कानून विशेषज्ञ सोली सोराबजी ने कहा कि वह सवालों से परे ईमानदारी वाले शख्स थे और वह हमेशा अच्छे सिद्धांत का समर्थन करते थे।