प्रॉपर्टी वेबसाइट 99acres.com के 'नो मुस्लिम' विज्ञापन पर विवाद के बाद अब विवादित शब्द 'नो मुस्लिम' हटा लिए गए हैं।
वेबसाइट ने विज्ञापन के प्रकाशन पर खेद भी जताया है। विज्ञापन जेसिंथा रियल एस्टेट नाम की कंपनी ने दिया था। विज्ञापन के साथ दिए गए फोन नंबर पर जब बीबीसी ने बात की, तो सफाई दी गई कि यह गलती से हुआ था।
जेसिंथा रियल स्टेट की ओर से कहा गया, 'यह गलती से हुआ था और यदि कोई मुस्लिम चाहे, तो इस प्रॉपर्टी को खरीद सकते हैं। यह एक छोटी गलती थी, जिसे बड़ा मुद्दा बनाया जा रहा है।'
मुसलमानों के साथ भेदभाव के सवाल पर उनका कहना था, 'काफ़ी बातें हैं, सभी को पता हैं और इस बारे में बात करना अभी अच्छी बात नहीं है।' लेकिन क्या मामला खेद प्रकट कर देने भर से खत्म हो गया है?
आयोग से शिकायत
पुणे के रहने वाले अधिवक्ता शहज़ाद पूनावाला ने इस मामले की शिकायत राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग से की है, जहां शुक्रवार को उनका पक्ष सुना जाएगा।
शहज़ाद कहते हैं, 'नो मुस्लिम विज्ञापन हमारे संविधान के बराबरी और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का खुला उल्लंघन है।'
शहज़ाद कहते हैं, 'इस विज्ञापन का अर्थ यह है कि यदि आप मुसलमान हैं तो इस देश को प्यार कर सकते हो, अच्छा कमा सकते हो, घर खरीदने की हैसियत रख सकते हो, लेकिन फिर भी आपको घर नहीं मिलेगा।
यह किसी आम आदमी के साथ नहीं हो रहा है। शबाना आजमी, सैफ अली खान, इमरान हाशमी जैसे सेलिब्रिटी के साथ भी ऐसा हुआ है।'
'यह विज्ञापन हमारे समाज में मौजूद पूर्वाग्रहों और मुसलमानों के प्रति नज़रिए का प्रतिबिंब है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि दाढ़ी या टोपी वाले मुसलमानों को रोज किस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता होगा।'
99acres.com की ओर से खेद प्रकट किए जाने पर शहज़ाद कहते हैं, 'यह अच्छी बात है कि वेबसाइट ने अपनी ग़लती मानी है। लेकिन ज़्यादा अच्छा होगा जब वेबसाइट लोगों के मिलजुलकर रहने के विषय पर कोई अभियान चलाए।'
शहज़ाद अल्पसंख्यक आयोग अध्यक्ष वजाहत हबीबुल्लाह से मिलकर अपना पक्ष रख रहे हैं। उनका कहना है कि अगर वहाँ संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई, तो वे इस मामले में जनहित याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं।
सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ़ एक विज्ञापन का मामला था। गूगल पर 'नो मुस्लिम' खोजने पर 99acres वेबसाइट की कई प्रॉपर्टी के लिंक मिलते हैं।
हालाँकि इन सभी से अब 'नो मुस्लिम' शब्द हटा लिए गए हैं। वेबसाइट 99acres।com की ओर से बीबीसी को कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी।
वेबसाइट 99acre.com पर पोस्ट किए गए इस विज्ञापन से अब 'नो मुस्लिम' हटा दिया गया है।
सवाल यह भी है कि क्या विज्ञापन से 'नो मुस्लिम' हटा लेने से धर्म के नाम पर लोगों को किराए पर घर लेने में आने वाली दिक्कतें कम हो जाती हैं?
मुस्लिम नाम से दिक्कत
सामाजिक कार्यकर्ता ख़ुर्शीद अनवर को अपने नाम की वजह से कई बार अच्छी हाउसिंग सोसायटी में घर नहीं मिला।
वे कहते हैं, 'किराया और बाक़ी शर्तें तय होने के बाद सिर्फ़ नाम की वजह से डील नहीं पाती थी। एक बार मैं सीधे मकान मालिक से मिला। वहाँ भी सब कुछ तय हो गया, लेकिन नाम पता चलने पर उन्होंने भी मना कर दिया।'
खुर्शीद आगे कहते हैं, 'मुझे जब काफ़ी वक्त तक अच्छी जगह रहने को घर नहीं मिला, तो मेरे अपने एक दोस्त ने मुझे घर किराए पर दिया।'
खुर्शीद अनवर समाज में सांप्रदायिकता बढ़ने और चरमपंथी घटनाओं में बढ़ोत्तरी को इसका बड़ा कारण मानते हैं। वे कहते हैं, 'बहुत से लोग हैं, जो मन से सांप्रदायिक नहीं हैं, लेकिन खुद को पुलिस पूछताछ जैसी परेशानियों से दूर रखने के लिए मुस्लिमों को घर देने के लिए साफ मना कर देते हैं।'
खुर्शीद अनवर कहते हैं कि सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि मुस्लिम बहुल आबादी वाले इलाक़े में बहुत कम हिंदू रहते हुए मिलेंगे और हिंदुओं के अनुभव भी ऐसे ही हैं।
हिंदुओं के साथ भी भेदभाव
पेशे से पत्रकार प्रशांत विभव सिंह बताते हैं, 'मेरे एक मित्र मुस्लिम इलाके में रहते हैं। मेरा अक्सर वहाँ जाना होता है। इलाक़ा मुझे अच्छा लगा, तो मैंने अपने मित्र से कहा कि मुझे वहाँ फ्लैट किराए पर दिलवा दीजिए।
उसने साफ तौर से कह दिया कि तुम हिंदू हो, इसलिए तुम्हें मकान नहीं मिलेगा।'
प्रशांत कहते हैं, 'मेरे मित्र ने कहा कि जिस तरह हिंदू मुसलमानों को घर किराए पर नहीं देते, उसी तरह मुसलमान भी हिंदुओं को घर किराए पर नहीं देते।
मुझे लगता है कि आँख के बदले आँख वाले इस बर्ताव से तो पूरी दुनिया ही अँधी हो जाएगी।'
जातिगत भेदभाव
एक समाचार चैनल में कार्यरत पत्रकार प्रकाश सिंह को तो हिंदू होने के बावजूद सिर्फ इसलिए मकान नहीं मिला था क्योंकि वे भूमिहार हैं और मकान मालिक राजपूत थे।
प्रकाश बताते हैं, 'एक अख़बार में नौकरी के लिए पटना गया। वहां मेरे भूमिहार होने की वजह से श्रीकृष्ण नगर में कई जगह फ्लैट नहीं दिया गया।
कई प्रॉपर्टी डीलरों ने कहा कि भूमिहार को लोग मकान नहीं देंगे। मजबूरी में मुझे राजपूत बनकर एक बड़े राजपूत राजनीतिक परिवार में किराए पर करीब एक महीने तक राजपूत बनकर रहना पड़ा।'
पेशे से सीए उज्जवल मोदी कहते हैं, 'मुझे लगता है कि इस भेदभाव की एक वजह यह भी है कि शाकाहारी लोग यह नहीं चाहते कि उनके घर में माँस पकाया या खाया जाए। लेकिन ज्यादातर मामलों में धर्म ही इस भेदभाव की बड़ी वजह होता है।'
मीडिया में कई बार इस मुद्दे पर रिपोर्टें आ चुकी हैं। सार्वजनिक तौर पर लोग इस सच्चाई को स्वीकार करने से भले ही बचते हों, लेकिन किराए पर घर खोजने वालों की मुश्किलें कम नहीं हुई हैं।
खुर्शीद अनवर कहते हैं, 'लिखने से थोड़ी जागरूकता जरूर आ सकती है, लेकिन किसी की मानसिकता बदलना मुश्किल काम है और सिर्फ खबरों से इस समस्या का हल संभव नहीं लगता।'