रेलवे देश के विभिन्न राज्यों में 89 मार्गों पर घाटे की रेल चला रही है। इन लाइनों पर ट्रेनों के संचालन से विभाग को हर साल 1189 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हो रहा है। वैसे घाटे के बावजूद रेल मंत्रालय का इन लाइनों पर ट्रेनों का संचालन बंद करने का कोई इरादा नहीं है। घाटे को कम करने के लिए समय-समय पर कुछ कदम जरूर उठाये जाते हैं।
रेल मंत्रालय के अनुसार देश में केवल ब्रांच लाइनों पर हर मार्ग के नफा-नुकसान का हिसाब रखा जाता है। रेलवे में बड़े शहरों को जोड़ने वाले व्यस्त मार्गों को मेन लाइन तथा छोटे शहरों को जोड़ने वाली लाइन को ब्रांच लाइन कहते हैं। इस समय देश में रेलवे 247 ब्रांच लाइनों के नफा नुकसान का हिसाब रखता है। इनमें से 89 लाइनों पर घाटे की स्थिति है।
घाटे की सर्वाधिक 29 ब्रांच लाइनें पश्चिम जोन में हैं। घाटे वाली लाइनों की सूची पर नजर डालें तो अधिकांश ऐसी हैं जो देश के सीमांत प्रदेश में स्थित हैं। इन मार्गों पर ज्यादातर दिन में एक या दो बार पैसेंजर ट्रेनें चलती हैं। सीमांत क्षेत्रों में कम आबादी होने के कारण सवारियां भी बहुत कम होती हैं।
उत्तर रेलवे में घाटे में चलने वाली ज्यादातर रेल लाइनें पंजाब तथा हिमाचल प्रदेश में हैं। जानकारी के अनुसार उत्तर रेलवे में कुल दस मार्गों पर घाटे की रेल चलती है। इनमें से आठ लाइनें पंजाब व शिमला में हैं। अमृतसर से अटारी बार्डर, अमृतसर-खेमकरण तथा कालका-शिमला के बीच भी रेलवे घाटे की रेल चला रहा है। अमृतसर से अटारी के बीच केवल समझौता एक्सप्रेस चलती है। इस रूट पर रेलवे को हर साल 12 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है।
रेलवे की जेब पर ट्वॉय ट्रेनें भी भारी
आर्थिक तंगी से जूझ रहे रेलवे के लिए पहाड़ी इलाकों में ट्वॉय ट्रेनों का संचालन काफी महंगा पड़ रहा है। कालका व शिमला के बीच (96 किमी.) ट्वॉय ट्रेन के संचालन पर रेलवे को हर साल 33 करोड़ रुपये से भी ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसी तरह पश्चिम बंगाल में न्यू जलपाईगुड़ी व दार्जिलिंग के बीच ट्वॉय ट्रेन के संचालन पर विभाग को 54 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।