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आजादी के 66 साल: मुट्ठी से निकला प्याज, मिला मोबाइल

Thu, 15 Aug 2013 07:33 AM IST
नई दिल्ली/संजय मिश्र
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किसी देश के लिए आजादी के 66 साल का सफर बहुत लंबा नहीं तो बहुत छोटा भी नहीं होता।
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इतना भी बड़ा नहीं कि हम उम्मीदें छोड़ दें, और इतना छोटा भी नहीं कि आगे देखा जाएगा के अंदाज में लंबी चादर तान कर सो जाएं। आज जरूरत पीछे मुड़कर देखने और भविष्य की राह बुनने की है।

15 अगस्त 1947 को आजाद भारत में आंखें खोलने के बाद हमने देश के लिए अपने लिए कई सपने बुने थे। इन्हें पूरा करने की कसमें खाई थीं।

मगर आजादी के इन 66 बरसों के बाद भी आज हमारी सत्ता सियासत भूख से लड़ने की जंग में ही उलझी पड़ी है। राजनीतिक व्यवस्था से गरीबों का भला नहीं हुआ तो अब कानून बनाकर जनता की पेट भरने का छलावा किया जा रहा है।
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मगर हकीकत तो यही है कि आजादी के इन बरसों में आज आम आदमी की मुठ्ठी से प्याज निकल गया है और मोबाइल आ गया है।

तब रोटी के साथ प्याज गरीबों का पेट भरने का जरिया था। आज गरीबों की कौन कहे मध्यवर्ग के लिए भी प्याज पहुंच से बाहर हो गया है।

सरकार के ही योजना आयोग के गांवों में 27 रुपये और शहरों में 33 रुपये रोजाना कमाने वालों को गरीब नहीं मानने के फार्मूले को देखें तो ऐसे लोगों को प्याज खाने के लिए बाकायदा लोन लेना होगा।

आजाद के इस सफर को कुछ इस तरह बयां किया जा सकता है कि मीलों पीछे छूट गए, मीलों आगे जाना है। हर पेट को अन्न और सबको शिक्षा मुहैया कराने का सपना अब भी हकीकत से कोसों दूर है।

देश की एकता और अखंडता का सवाल हमें अब और अधिक शिद्दत से परेशान करता रहा है। सांप्रदायिक वैमनस्य न केवल बदस्तूर जारी है, बल्कि इसका चेहरा मेरठ, भागलपुर, गुजरात से होते हुए हालिया किश्तवाड़ तक में पहले से अधिक गहरा हो गया है।

पूर्वोत्तर के राज्यों के साथ जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद के बीज को हम अब तक उखाड़ नहीं पाए हैं। सबसे शर्मनाक स्थिति देश में लगातार विकराल होता गया भ्रष्टाचार है।

हमारे जीवन के हर क्षेत्र समाज, राजनीति और पूरी व्यवस्था में भ्रष्टाचार अंगद के पांव की तरह जम गया है। नई सदी ने तो भारतीय राजनीति में टूजी, राष्ट्रमंडल और कोयला घोटाले के भ्रष्टाचार के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए हैं।

सर्वसुलभ न्याय की उम्मीदें टूट रही हैं तो आधी आबादी के सशक्तिकरण का मामला नारों की दुनिया से बाहर नहीं निकल पाया है।

विडंबना ही है कि आजादी के इतने अरसे बाद हम अब भी भूख मिटाने की जद्दोजहद से ही जूझ रहे हैं। अब हम नाकामी की इस इबारत को ढकने के लिए खाद्य सुरक्षा कानून का चादर ओढ़ाने जा रहे हैं।

चिकित्सा के क्षेत्र में चाहे हमने कितनी ही प्रगति कर ली हो मगर आम आदमी के लिए साधारण बीमारी का इलाज करा पाना बाधा दौड़ जीतने से कम नहीं होता।

हालांकि मुंह चिढ़ाते इन विकराल मुद्दों की घनघोर घटा में उम्मीद की किरण जगाने वाली हासिल की गई कई गौरवपूर्ण मंजिलें भी हैं। बेशक इनकी संख्या अंगुलियों पर गिनी जा सकती है।

मसलन सूचना प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष के क्षेत्र में हमने विश्व मंच पर झंडा गाड़ा है। सूचना का अधिकार कानून देश के लिए क्रांतिकारी साबित हुआ है। और इसके साथ ही तमाम सवालों जूझ रहा हमारा संसदीय लोकतंत्र पहले की तुलना में और मजबूत हुआ है।

उम्मीदें धराशायी होने के कारण राजनीतिज्ञों के प्रति देश में गहरा रोष तो है मगर अब भी लोग इसी संसदीय लोकतंत्र के सहारे मजबूती के साथ नए विकल्प ढूंढने में लगे हैं।

हां, चिंताजनक तथ्य यह है कि राजनीति में नैतिक मूल्य, भ्रष्टाचार और न्याय उपलब्ध कराने के मामले में तो हम आजादी के पहले की स्थिति से भी पीछे चले गए हैं। समूची राजनीति पर धीरे धीरे धनकुबेरों और गिने चुने परिवारों का कब्जा होता जा रहा है।
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फिर सवाल आजादी के बाद से ही विश्व की बड़ी ताकत बनने के सपने की है। तमाम दावों के बावजूद दुनिया ने हमें अब भी महाशक्ति का दर्जा नहीं दिया है।

जाहिर है इन तमाम मोर्चों पर चुनौतियों से जूझने और पार पाने के लिए हमें आगे के सफर में नए रास्ते बनाने के साथ ही नई मंजिलें तय करनी होंगे। क्योंकि इक्कीसवीं सदी में राष्ट्रों की सफलता की कहानी का मूल तत्व चुनौतियों को पार कर नए प्रतिमान गढ़ना है।
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