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650 साल पहले भी पहाड़ पर आया था प्रलय

Wed, 26 Jun 2013 12:42 AM IST
फर्रुखाबाद/अखिलेश कुमार
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कन्नौज-फर्रुखाबाद से देवभूमि गए अनेक श्रद्धालुओं के लौटने का सिलसिला जारी है। अभी तक किसी के जान गंवाने की खबर नहीं है।
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14वीं शताब्दी में उत्तराखंड गए कन्नौज के राजा, रानी के साथ ही उनकी सेना वहीं दफन हो गई थी।

तब फर्रुखाबाद भी कन्नौज रिसायत का हिस्सा था। इतिहासकारों की मानें तो  650 साल पूर्व कन्नौज के राजा यशधवल, उनकी गढ़वाली रानी बल्लभा व सैनिक भी उत्तराखंड में ऐसी आपदा की भेंट चढ़ गए थे।

इनके अस्थिपंजर उत्तराखंड के रूपकुंड में अब भी मिलते हैं। यह सभी लोग कन्नौज से उत्तराखंड नंदाराज जात को निकले थे।

इस बात का जिक्र गढ़वाली लोकगीतों के साथ ही फर्रुखाबाद-कन्नौज के इतिहास से जुड़ी पुस्तकों में भी मिलता है।

ऐतिहासिक तथ्यों पर गौर करें तो कन्नौज के राजा यशधवल की रानी बल्लभा गढ़वाल की रहने वाली थीं। राजा अपनी गर्भवती पत्नी बल्लभा के साथ कुछ सैनिकों को लेकर नंदाराज जात को निकले थे।
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हरिद्वार-ऋषिकेश होते हुए यह सभी लोग बाण गांव तक पहुंचे। यहां से आगे बढ़ने पर बगुवावासा के पास गंगतोली गुफा में रानी बल्लभा को प्रसव  पीड़ा हुई।

उन्होंने बेटी को जन्म दिया। इसके बाद ओलावृष्टि के साथ सैलाब आ गया।

राजा रानी व ज्यादातर सैनिक उसमें समा गए। कुछ सैनिक बचने के लिए भागे। वे ज्यूंरागली से आगे रूपकुंड तक ही पहुंच पाए थे कि वे भी चपेट में आ गए।

गंगतोली की गुफा को बल्लभ स्वेलड़ा ( बल्लभ का प्रसूति गृह) कहा जाता है।

प्रसूति के समय पुआल जिस पुआल पर बच्ची को जन्म दिया था नंदाकिनी नदी में बह गई। इसी मान्यता की वजह से पर्वकाल में नंदाकिनी का जल आज भी देवी देवताओं को नहीं चढ़ाया जाता है।

फर्रुखाबाद व कन्नौज में यशधवल व बल्लभा के पार्वती से माफी मांगने की कथा प्रचलित है। बल्लभा गढ़वाल के राजा की बेटी थीं। मान्यता है कि पार्वती का  मायके से ससुराल जाते समय कन्नौज में बिछुवा गिर गया था।
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पार्वती को यहां समुचित आदर नहीं मिला। उन्होंने बल्लभा से राज पाट मांगा। बल्लभा ने इन्कार कर दिया। इससे वह शाप देकर चली गईं।

इस शाप के बाद कन्नौज में अकाल के हालात बन गए। भविष्यवक्ताओं की सलाह पर राजा रानी माफी मांगने के लिए नंदाराज जात को निकले थे।

फर्रुखाबाद के इतिहास से जुड़ी पुस्तकों में इस बात का जिक्र है कि 1957 में भूगोलवेत्ता व नृशास्त्री स्वामी प्रणवानंद ने इन अस्थि-पंजरों को नंदाराज जात के यात्रियों का होना बताया था।

फर्रुखाबाद में एसपी रहे गिरिराजशाह की पुस्तक में भी इसका जिक्र है।
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