क्या शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने से देश में प्राथमिक शिक्षा का स्तर दिनों दिन ज्यादा खराब हो रहा है? एनुअल स्टेटस ऑफ एजूकेशन रिपोर्ट (असर)-2012 की रिपोर्ट तो इसी ओर संकेत करती है। आरटीई ने आठवीं तक बच्चों को परीक्षा के आधार पर फेल करने पर भले ही रोक लगा दी किंतु इसके स्थान पर बच्चों के सतत मूल्यांकन प्रक्रिया (सीसीएस) को लागू करने में केंद्र व राज्य सरकारें पूरी तरह असफल रही हैं।
परिणामस्वरूप लगातार तीसरे साल भी बच्चों के सीखने, पढ़ने की क्षमता में भारी कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2010 की तुलना में वर्ष 2012 में पांचवीं के बच्चों की रीडिंग क्षमता में सात फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट निजी स्कूलों की तुलना में सरकारी स्कूलों में अधिक है।
मानव संसाधन विकास मंत्री पल्लम राजू ने बृहस्पतिवार को शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत प्रथम संस्था द्वारा तैयार एनुअल स्टेटस ऑफ एजूकेशन रिपोर्ट (असर) जारी की। इसके अनुसार देश में सरकारी प्राथमिक स्कूलों में इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थिति सुधरी है। आरटीई के चलते देश में 6 से 14 वर्ष आयु वर्ग के 96 फीसदी बच्चे स्कूल भी जा रहे हैं। मगर उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान में 11 से 14 आयु वर्ग की लड़कियों के नामांकन में पिछले साल से दो प्रतिशत की कमी आई है।
रिपोर्ट के अनुसार इस साल भी निजी स्कूलों में बच्चों के नामांकन में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी लगातार निजी स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार 2012 में जम्मू कश्मीर, पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में प्राइमरी स्तर के 40 फीसदी बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। आठवीं तक के 25 फीसदी बच्चे पैसे देकर निजी ट्यूशन पढ़ते हैं। इसमें सरकारी व निजी दोनों स्कूलों के बच्चे शामिल हैं।
रिपोर्ट में सबसे बड़ी चिंता प्राइमरी स्तर पर बच्चों के सीखने, पढ़ने खासकर गणित को समझने के स्तर में लगातार गिरावट पर व्यक्त की गई है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010 में पांचवीं के 53.7 फीसदी बच्चे कक्षा दो के स्तर का पाठ पढ़ने में सक्षम थे लेकिन वर्ष 2012 में यह अनुपात गिरकर 46.8 फीसदी रह गया है।
वर्ष 2012 को भारत ने गणित वर्ष के रूप में मनाया था लेकिन प्राइमरी स्तर के बच्चों के लिए बुनियादी गणित सीखने के लिहाज से यह साल काफी खराब रहा। वर्ष 2010 में जहां पांचवीं के 71 फीसदी बच्चे दो अंकों का जोड़-घटाव कर पाने में सक्षम थे वहीं 2012 में यह औसत गिरकर 53.5 फीसदी रह गया। दक्षिण के कुछ राज्यों को छोड़कर सभी प्रमुख राज्यों के बच्चों में गणित के क्षेत्र में यह गिरावट दर्ज की गई है।