बिहार के चारा घोटाले की तरह ही अब दिल्ली में बंदरों के खाने में घोटाले की बात सामने आई है। इसमें एक साल के अंदर बंदरों के भोजन का खर्च 200 गुना तक बढ़ गया।
दिल्ली में बंदरों के नाक में दम करने के बाद हाइकोर्ट के आदेश पर उन्हें अभयारण्य में रखकर खाना मुहैया कराया जाना था।
इसके लिए दिल्ली वन विभाग के एक जूनियर अधिकारी को असोला भाटी वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में हर महीने 16 हजार बंदरों को खिलाने का काम सौंपा दिया गया। उसे इस काम के लिए हर महीने 25 लाख रुपए भी दिए जाते हैं, जबकि ऐसे कार्यों के लिए टेंडर निकाले जाने का नियम बानाया गया है।
दिल्ली ऑडिट विभाग की जुलाई 2013 ऑडिट रिपोर्ट में यहां पर खुलेआम नियमों का उल्लंघन होने का मामला सामने आया है। नियमों के मुताबिक बेहतर विकल्प के लिए बंदरों के खाने का ठेका दिया जाना चाहिए था और इसके लिए टेंडर निकालने की प्रक्रिया हैं।
एक साल में दो करोड़ बढ़ा खर्च
साल 2008 से 2010 के बीच के आंकड़ों के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक बंदरों के खाने की खरीद, वितरण, मात्रा और भोजन की संरचना पर नजर रखने के लिए समिति बनाने की बजाए एक डिप्टी रेंज के अधिकारी पर सबकुछ छोड़ दिया गया। उसके कार्यों की समीक्षा भी नहीं की गई।
रिपोर्ट के मुताबिक बंदरों के खाने का बिल जहां 2008-09 के बीच एक करोड़ था वहीं, अगले साल बढ़कर तीन करोड़ हो गया। एक साल में ही 200 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो गई। अगर इस मामेल में वन विभाग ध्यान देता तो खर्चे को कम किया जा सकता था।
कोर्ट के सुझावों को किया दरकिनार
साल 2007 में हाइकोर्ट के आदेश के बाद वनविभाग बंदरों के आवासीय क्षेत्रों से पकड़कर असोला अभ्यारण्य में रख रहा है। यह आदेश वर्ष 1997 में दिल्ली के डिप्टी मेयर एसएस बाजवा के बंदरों के हमले में मौत के बाद दिया गया।
इसके लिए कोर्ट ने खर्चा कम करने के कुछ उपाय भी सुझाए थे लेकिन वन विभाग ने उन पर ध्यान नहीं दिया। एक आरटीआई के जवाब में वन विभाग ने बताया है कि बंदरों के भोजन के लिए कभी टेंडर नहीं निकाला गया। साथी ही बंदरों के लिए पानी के तालाब और जलाशय भी नहीं बनाए गए हैं।