फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

1965: जब भारतीय ठिकानों पर पाक सैनिक उतरे

Tue, 08 Sep 2015 04:00 PM IST
रेहान फजल/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
विज्ञापन
विज्ञापन
छह और सात सितंबर, 1965 की रात को जब पाकिस्तान के बी-57 विमानों ने भारतीय ठिकानों पर बमबारी के लिए उडान भरी तो उनके पीछे तीन सी 130 हरकुलस ट्रांसपोर्ट विमानों ने भी भारतीय सीमा का रुख किया। हर विमान में एलीट स्पेशल सर्विसेज ग्रुप के साठ-साठ कमांडो सवार थे।
विज्ञापन


उनका लक्ष्य था तीन भारतीय हवाई अड्डों हलवारा, आदमपुर और पठानकोट पर रात के अंधेरे में पैराशूट के जरिए उतरना, उन पर कब्जा करना और वहां मौजूद भारतीय विमानों को नष्ट करना। जैसे ही मेजर खालिद बट्ट के नेतृत्व में रात 2 बजे, 60 पाकिस्तानी कमांडो पठानकोट एयर बेस के नजदीक उतरे, उनको एक के बाद एक मुसीबतों ने घेर लिया।

हवाई अड्डे के आसपास नहरों, झरनों और कीचड से भरे खेतों ने उनकी गति को अवरुद्ध किया।तीन घंटों में ही पौ फटने लगी और तब तक एक गांव वाले ने पठानकोट सब एरिया मुख्यालय को उनके उतरने की सूचना दे दी।आनन-फानन में करीब 200 लोग जमा किए गए।
विज्ञापन

पाकिस्तान भागने में हुए सफल

अधिकतर कमांडोज अगले दो दिनों में हिरासत में ले लिए गए।आनन-फानन में करीब 200 लोग जमा किए गए। अधिकतर कमांडोज अगले दो दिनों में हिरासत में ले लिए गए।दो दिन बाद उनका नेतृत्व कर रहे मेजर खालिद बट्ट भी पकडे गए।

हलवारा में रात के अंधेरे के बावजूद नीचे से उतरते हुए छाताधारी सैनिक साफ दिखाई दे रहे थे।हवाई ठिकाने के सुरक्षा अधिकारी ने सभी एयरमैन और अफसरों में राइफलें और पिस्टल बांट कर निर्देश दिया कि हवाई अड्डे से सटे घास के मैदानों में जैसे ही उन्हें कोई हरकत दिखाई दे, वो बिना झिझके गोली चला दें।

कुछ पाकिस्तानी कमांडो वास्तव में हवाई ठिकाने के प्रांगण में गिरे थे, लेकिन इससे पहले कि वो हरकत में आ पाते, उन्हें युद्धबंदी बना लिया गया। हालांकि जॉन फ्रिकर अपनी किताब 'बैटिल फॉर पाकिस्तान' में लिखते हैं कि उनमें से एक कमांडो मेजर हजूर हसनैन ने जबरन एक भारतीय जीप का अपहरण कर लिया और वो अपने एक साथी के साथ वापस पाकिस्तान भागने में सफल हो गए।

मक्के के खेत में शरण ली

हलवारा बेस में ग्राउंड ड्यूटी में काम कर रहे वित्त विभाग के प्रमुख स्कवार्डन लीडर कृष्ण सिंह ने खुद पाकिस्तानी कमांडोज के लीडर को पकडा। वो अकेले गैर सैनिक थे जिन्हें 1965 और 1971 दोनों युद्धों में इसी तरह के कारनामे के लिए वीर चक्र दिया गया। आदमपुर में भी पाकिस्तानी सैनिकों का यही हाल हुआ।

उन्हें एयर बेस से काफी दूर गिराया गया जिसकी वजह से वो एकत्रित नहीं हो पाए। रात में भौंकते हुए कुत्तों ने उनका राज खोल दिया।सूरज निकलते ही उन्होंने मक्के के खेतों में शरण ली।

उनको लुधियाना से आए एनसीसी के युवकों ने ढूंढा। कुछ छाताधारियों को क्रोधित गांव वालों ने मार डाला।कुल 180 छाताधारियों में से 138 को बंदी बनाया गया, 22 सेना, पुलिस या गांव वालों के साथ मुठभेड में मारे गए और करीब 20 वापस पाकिस्तान भागने में सफल हो गए।

गिरफ्तार कर लिए गए सैनिक

इनमें से अधिकतर लोग वो थे जिन्हें पठानकोट एयरबेस पर गिराया गया था क्योंकि वहां से पाकिस्तानी सीमा की दूरी मात्र 10 मील थी।पीवी एस जगनमोहन और समीर चोपडा अपनी किताब 'द इंडिया पाकिस्तान एयर वार' में लिखते हैं, "60 कमांडोज का ग्रुप शायद एक बडा समूह था जो लोगों का ध्यान खींचे बगैर अपना काम अंजाम नहीं दे सकते थे।


दूसरे लिहाज से यह एक छोटा समूह भी था जो घेर लिए जाने पर अपने आप को बचाने की क्षमता नहीं रखता था।"पाकिस्तान ने गुवाहाटी और शिलांग में भी कुछ छाताधारी सैनिक गिराए लेकिन वो सभी कोई भी नुकसान पहुंचाने से पहले गिरफ्तार कर लिए गए।इन सब घटनाओं ने कई बार दोनों देशों में बहुत हास्यास्पद स्थिति पैदा कर दी।

एक बार एक ड्यूटी ऑफिसर को सपने में छाताधारी सैनिक दिखाई दिए।वो नींद में ही चिल्लाया, "दुश्मन, दुश्मन, फायर फायर।" चूंकि चारों तरफ ब्लैक आउट की वजह से घुप्प अँधेरा था, इसलिए लोग देख नहीं पाए कि ये आवाज कहां से आ रही है। कई लोग जाग गए और चारों तरफ शोर मच गया।

फैल गई अफवाह

पिस्टलें निकाल ली गईं लेकिन इससे पहले कि शूटिंग मैच शुरू होता, कमांडिंग ऑफिसर को सारा माजरा समझ में आ गया।एयर मार्शल भूप बिश्नोई याद करते हैं, "हलवारा में छाताधारी सैनिकों के उतरने के बाद दिल्ली के पास हिंडन एयरबेस पर भी ये अफवाह फैल गई कि वहाँ पर पाकिस्तानी पैराड्रॉप होने वाला है, चूंकि हिंडन एक फैमिली स्टेशन था, वहाँ के सीओ ने कहा कि लोग अगर चाहें तो अपने बीवी बच्चों को सुरक्षित जगह पर छोड कर आ सकते हैं।

जिसको जो सवारी मिली वो उसमें अपने परिवार वालों को बैठा कर दिल्ली की ओर भागा।"इससे भी दिलचस्प घटना पाकिस्तान में हुई। वहां खबर आई कि भारतीय छाताधारी सैनिक सरगोधा हवाई अड्डे पर उतारे जाने वाले हैं।

पाकिस्तान के एयर हेड क्वॉर्टर ने कमांडोज से लदा हुआ सी-130 विमान सरगोधा के लिए रवाना कर दिया।जब वो विमान अंधेरे में सरगोधा एयर बेस पर उतरा और उसमें से कमांडोज नीचे उतरने लगे तो एक जरूरत से ज्यादा सावधान संतरी ने समझा कि वो भारतीय पैरा ट्रूपर हैं और दोनों पक्षों के बीच गोलियाँ चलने लगीं।
विज्ञापन

आप सिर्फ कल्पना कर सकते हैं

इस गलतफहमी की गोलीबारी में कितने लोग हताहत हुए, इसका पता नहीं चल पाया। ( एटर कॉमॉडोर मंसूर शाह, द गोल्ड बर्ड : पाकिस्तान एंड इट्स एयरफोर्स)इसी तरह पठानकोट में संभावित छाताधारी हमले से बचने के लिए सभी अधिकारियों को 9 एमएम की स्टेन कारबाइन दी गई।

फ्लाइट लेफ्टिनेंट पठानिया को भी एक कारबाइन मिली।चूंकि उन्हें उसे चलाना नहीं आता था, फ्लाइट लेफ्टिनेंट तुषार सेन उन्हें कारबाइन चलाने के गुर सिखा रहे थे।तभी उनकी उंगलियाँ फिसलीं और कारबाइन से 9 एमएम गोलियों का पूरा बर्स्ट वहाँ आराम कर रहे पायलटों के सिरों के कुछ इंच ऊपर से निकल गया।

उसके बाद आपस में जो शब्दों की बौछार हुई, उसकी आप सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं। (फोटो में- 1965 युद्ध में फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट पठानिया ने पाकिस्तान का पहला सेबर जेट विमान गिराया था. )
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें