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वो स्वस्थ रहें और हम जाएं कूड़े में !

Sat, 06 Apr 2013 05:07 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
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सोचिए जरा, आपका पड़ोसी अपना घर साफ रखने के लिए अपने घर का कूड़ा आपके घर में फेंक दे, कितना बुरा लगेगा? लेकिन वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो यह एक कड़वा सच है।
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दुनिया के विकसित देश खुद को स्वच्छ रखने के लिए अपना कूड़ा कचरा विकासशील खासकर भारत, इंडोनेशिया और चीन जैसे देशों में डंप कर रहे हैं। रिसाइकिलिंग के नाम पर भेजे जा रहे कचरे के चलते खुद भारत विश्व के सबसे बड़े कचरेघर में तब्दील होता जा रहा है।



ब्रिटेन के 'डिपार्टमेंट ऑफ इवयारमेंट, फूड एंड रूरल अफेयर' द्वारा जारी एक रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि हर साल 12 मिलियन टन के कचरे का आखिर क्या होता है। चिंता की बात ये है कि कचरे को विदेशों खासकर एशिया में भेजने का यह सिलसिला पिछले एक दशक में दुगना हो गया है।
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कानून कहता है कि विदेश भेजने के बाद कचरे की रिसाइकिलिंग अनिवार्य है जबकि पर्यावरण विभाग खुद ये स्वीकार करता है कि कुछ देशों में रिसाइकिलिंग के नाम पर कचरा जलाया या धरती में दबाया जा रहा है।

भारत सबसे बड़ा कचराघर
इस बात की सबसे ज्यादा चिंता भारत को होनी चाहिए क्योंकि अन्य विकासशील देशों की तुलना में भारत विश्व के सबसे बड़े कचराघर में तब्दील हो गया है।

पर्यावरण एजेंसियां भी इस बात पर चिंता जाहिर कर चुकी है कि जितना कचरा विदेशों से भारतीय बंदरगाहों पर आता है उसमें से महज 40 या 50 फीसदी कचरा ही रिसाइकिल हो पाता है। बाकी का खतरनाक कचरा (इसमें प्लास्टिक, टायर और ई कचरा शामिल है) या तो जला दिया जाता है या फिर धरती में दबा दिया जाता है।



कचरा दबाने का क्या है नुकसान
भारत में जितनी मात्रा में कचरा धरती में दबाया जा रहा है, उतनी ही तेजी से लैंडफिल गैसों के उत्सर्जन का खतरा बढ़ रहा है। धरती में दबे कचरे से लैंडफिल गैसों का उत्सर्जन होता है जिससे पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित होता है और जनता में भयानक बीमारियां पैदा होती है। ध्यान रहे लैंडफिल गैसों के चलते कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी भी हो सकती है।

पहले विकसित देश भी अपना कूड़ा धरती में दफना देते थे लेकिन इस पर प्रतिबंध लगने के बाद उन्होंने अपना कचरा डंप करने के लिए उन देशों की तलाश की जहां रिसाइकिलिंग के नाम पर कचरा निर्यात किया जा सके। यकीन नहीं होगा लेकिन विश्व के 105 देश अपना औद्योगिक कचरा भारत भेजते हैं।

आर्थिक पेंच भी है
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि आर्थिक दृष्टि से भी विकसित देशों के लिए अपना कचरा निर्यात करना फायदेमंद है। दरअसल ब्रिटेन, अमेरिका और जर्मनी में विषैले कचरे को रिसाइकिल करने में 140 पाउंड खर्च होते हैं। दूसरी तरफ यही कचरा अगर रिसाइकिलिंग के लिए भारत भेजा जाए तो इस पर महज 40 पाउंड का खर्च होगा।



हमारी बड़ी लाचारी
इस मसले पर सबसे बड़ी और चिंताजनक बात ये है कि इसमें विदेशों को दोष नहीं दिया जा सकता। विदेशों में बाकायदा कचरा निस्तारण के लिए कानून बने हैं। लेकिन भारत सरकार इस खतरे को भांपने के बावजूद इस संबंध में कानून बनाने की नहीं सोच रही। महज कुछ आर्थिक फायदे के लिए भारतीय कानून पर्यावरण और भारतीय जनता की जान को इतना बडा खतरा मोल लेने दे रहा है।

दुनिया भर में चिंता का विषय बन चुके कचरा निस्तारण पर गंभीर कदम उठाने की बजाय भारत सरकार बेसल कन्वेंशन को समर्थन दे रही है। ऐसी पालिसी जिसके तहत भारत अपने बंदरगाहों पर विकसित देशों को अपना कचरा निर्यात करने की सहमति देता है।

विकसित देश इस पॉलिसी का समर्थन नहीं करते और धड़ाधड़ अपना कचरा भारत में डंप कर रहे हैं। भले ही कचरा बंदरगाहों से निकल कर गलियों और घरों में घुसे और जनता  कचरे के ढेर पर बैठ जाए, हमे इसे रोकने की जरूरत है।
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