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और संकोच में कुछ भी न बोल पाए गायक मुकेश

Sat, 28 Sep 2013 04:25 PM IST
रामकृष्ण की आंखों देखा किस्सा
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गायक मुकेश मेरे पूर्व परिचित नहीं थे, लेकिन एक बार जब उनसे मुलाकात हुई तो फिर हम दोनों एक दूसरे के होकर रह गए। उनसे पहली बार मैं मिला था `तीसरी कसम’ के सॉन्ग-रिकॉर्डिंग सेशन में। उसकी तैयारी में उन्होंने घंटों लगा दिए थे।
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मोहम्मद रफी की तरह वह आशु-गायक नहीं थे। उनसे मैंने यह बात कही भी। उत्तर में संकोच की मुद्रा में उन्होंने जवाब दिया था, `रफी मेरे बड़े भाई के समान हैं, उनके साथ अपनी तुलना करना मुझे मौजू नहीं लगता।’

उनका यह संकोची स्वभाव बाद में भी बना रहा। सार्वजनिक मंचों पर अपने को प्रस्तुत करने से वह सदा विरत रहे और अगर कभी ऐसे आयोजनों में भाग लेने की जरूरत पड़ी भी तो विवशतापूर्वक ही उनमें उन्होंने अपना योगदान किया। मैंने स्वयं कई बार उत्तर प्रदेश फिल्म पत्रकार संघ के पुरस्कार समर्पण समारोहों में उनको आमंत्रित करने की पहल की, लेकिन हमेशा हमें निराश होना पड़ा।
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ऐसी अवस्था में एक बार जब उनका फोन मिला कि अपने निकट-संबंधी शिक्षाविद् वीरेन्द्र स्वरूप द्वारा आयोजित किसी पारिवारिक समारोह में भाग लेने वह कानपुर आए हुए हैं और मुंबई वापसी के लिए वहां से कोई सीधी फ्लाइट न मिलने के कारण उन्हें लखनऊ से जहाज पकड़ना पड़ेगा, तो मुझे बेहद प्रसन्नता हुई।

उन्होंने सूचित किया कि सरेशाम वह मेरे घर पहुंच जाएंगे, रात भर गपशप करेंगे और सुबह-सवेरे अपनी फ्लाइट पकड़ कर बम्बई रवाना हो जाएंगे। उनका यह फोन मुझे दोपहर के आसपास मिला था। ऐसी हालत में किसी भारी-भरकम कार्यक्रम के आयोजन का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था।

पर मैंने उस्ताद रहीमुद्दीनखां डागर, उस्ताद अहमदजान थिरकुवा और उस्ताद सादिक अली खां जैसे लखनऊ स्थित संगीत के तत्कालीन धुरंधरों को सूचित कर दिया कि मुकेश के स्वागत में एक संगीत गोष्ठी मैं आयोजित कर रहा हूं, उसमे भाग लेकर वे सब मुझे अनुग्रहीत करें।

मुकेश जब मेरे घर पहुंचे, तो इतने भारी-भरकम संगीतविदों को वहां पाकर उन्हें आश्चर्य हुआ। तीनों उनके लिए सुपरिचित नाम थे। फिर खाने-पीने के बाद हमारी जो गोष्ठी शुरू हुई वह सूरज निकलने के बाद ही समाप्त हो पाई। यह शिकायत करने का मौका मुकेश को मिल ही नहीं पाया कि बगैर उनकी पूर्व-अनुमति वह कार्यक्रम मैंने क्यों आयोजित कर डाला था।
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