यह दिलचस्प किस्सा है। किस्सा लता मंगेशकर के प्रेम और शादी के प्रस्ताव से जुड़ा है।
‘ऐ मेरे वतन के लोगो...’ गीत गाने के मौके पर एक नाम फिर चर्चा में आया। संगीतकार सी.रामचंद्र। हिंदी फिल्मों को सी.रामचंद्र ने कई सदाबहार गीत दिए। इनमें ये जिंदगी उसी की है, गोरे गोरे ओ बांके छोरे, भोली सूरत दिल के खोटे, तू छुपी है कहां, दिल लगा कर हम ये समझे, कितना हसीं है मौसम और इना मीना डिका जैसे विविधता से भरे गाने शामिल हैं।
उनकी पहली फिल्म थी ‘सुखी जीवन’ (1942) और आखिरी ‘तुलसी विवाह’ (1971)। संगीत की दुनिया में लता मंगेशकर और सी.रामचंद्र का साथ 1949 से 1958 तक था। इस दौरान इस जोड़ी ने कई दर्जन हिट गीत दिए। सी.रामचंद्र अपने गीतों में जहां तक संभव होता था लता के अलावा और किसी गायिका को नहीं लेते थे।
लता से शादी करने का प्रस्ताव
लता के साथ उनकी हिट जोड़ी बनने के बाद दोनों की नजदीकियों की बातें भी होने लगी थीं। हालांकि लता ने इस बारे में कभी खुल कर नहीं कहा, परंतु बताया जाता है कि सी.रामचंद्र के व्यक्तित्व से लता बहुत प्रभावित थीं और उन्हें पसंद भी करती थीं। कहीं कहीं मिलता है कि सी.रामचंद्र लता से शादी करना चाहते थे और लता ने इंकार कर दिया था।
जिससे नाराज होकर उन्होंने खुद दोनों के बारे में फालतू बातें फैलाना शुरू कर दी थीं। जबकि कुछ बातें इससे उलट मिलती हैं। एक इंटरव्यू में सी.रामचंद्र ने कहा था कि लता उनसे शादी करना चाहती थीं, परंतु उन्होंने इंकार कर दिया क्योंकि वह पहले से शादीशुदा थे। लेकिन रोचक बात यह है कि लता को इंकार करने की बात कहने वाले सी.रामचंद्र ने इस घटना के बाद अपनी एक अन्य महिला मित्र शांता को दूसरी पत्नी बना लिया था।
पर यह एक रहस्य बना ही रहा
1958 में सी.रामचंद्र के साथ व्यावसायिक रिश्ते खत्म कर लेने के बारे में लता ने एक इंटरव्यू में कहा था कि एक रेकॉर्डिस्ट इंडस्ट्री में मेरे बारे में उल्टी-सीधी बातें फैला रहा था और मैंने सी.रामचंद्र से कहा कि उसे हटा दें। परंतु वह उस रेकॉर्डिस्ट के साथ काम करने पर ही अड़े हुए थे। इस बात के बाद मैंने उनके साथ काम न करने का फैसला किया।
फिर आया 1963 में तैयार गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों...’ जिसमें लता और सी.रामचंद्र की जोड़ी का जादू दुनिया ने देखा। कहा जाता है कि सी.रामचंद्र इस गीत को पहले आशा भोंसले से गवा रहे थे, मगर गीतकार कवि प्रदीप ने लता इस संगीतकार के साथ गाने के लिए मना लिया। लता ने अकेले यह गीत गाने की जिद की और आशा को हटना पड़ा।
लता ने भी तोड़ी इस मामले पर चुप्पी
इस मामले में भी लता का कुछ और कहना है। एक इंटरव्यू में लता ने कहा था, ‘यह गाना पहले मुझे और आशा को साथ गाना था। लेकिन सी.रामचंद्र ने जोर दिया कि केवल मैं ही इसे गाऊं। इसलिए आशा को हटना पड़ा।’ इन विरोधाभासी भरी बातों के बाद लता और सी.रामचंद्र के बीच इतनी कड़वाहट आ गई थी कि 1967 में एक बड़ी रिकॉर्डिंग कंपनी के लिए लता ने जब अपने दस सर्वश्रेष्ठ फिल्मी गानों का एलबम बनाया तो उसमें सी.रामचंद्र के संगीत वाला एक भी गीत नहीं रखा।
लता उन दिनों हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया की सबसे ताकतवर हस्ती थीं और उस दौर में हुए रॉयल्टी विवाद में मोहम्मद रफी से भी लोहा ले रही थीं। लता के प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब उन्होंने सी.रामचंद्र के संगीत निर्देशन में गाना बंद कर दिया तो प्रोड्यूसरों-डायरेक्टरों ने भी इस संगीतकार से किनारा कर लिया।
जानकार मानते हैं कि लता की नाराजगी के कारण शिखर पर होने के बावजूद सी.रामचंद्र का कैरियर खत्म हो गया। सी.रामचंद्र के साथ संबंधों के किसी पक्ष पर लता ने खुल कर बात नहीं की। भविष्य में भी यह संभव नहीं दिखता है। ऐसे में तय है कि इन रहस्यों पर से कभी पर्दा नहीं उठेगा।