जॉन अब्राहम की आने वाली फिल्म है `शूटआउट एट वडाला’। संजय गुप्ता के निर्देशन में बनी इस फिल्म में जॉन ने एक कुख्यात गैंगस्टर का किरदार निभाया है। खुद जॉन का कहना है कि यह उनके अभिनय कैरियर की सबसे चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में से एक है।
इधर `विकी डोनर’ जैसी फिल्म के बाद जॉन की गिनती एक सफल फिल्म प्रोड्यूसर के तौर पर भी होने लगी है। जॉन ने अपनी अपनी फिल्मों के लेकर अमर उजाला के साथ बातचीत की,
'शूटआउट एट वडाला' में आपने एक कुख्यात गैंगस्टर मान्या सुर्वे का किरदार निभाया है। इस भूमिका ने आपको कितनी चुनौती दी?
मान्या सुर्वे को पहला हिंदू डॉन माना जाता है। यह एक जटिल किरदार है। इसे अभिनीत करने से पहले मुझे निजी तौर पर भी काफी स्टडी करनी पड़ी। मैं उस जगह गया, जहां वह रहता था। उसके समय के कुछ लोगों से मैंने बातचीत की और कई पुलिस वालों से भी मिला।
आप फिल्म के हीरो हैं, लेकिन मान्या तो एक डॉन था?
`शूटआउट एट वडाला’ हीरो और हीरोइन वाली रुटीन फिल्म नहीं है। यह हुसैन जैदी की किताब `डोंगरी टू दुबई’ पर आधारित है। यह किताब मैंने गंभीरतापूर्वक पढ़ी है। मान्या के किरदार के लिए मैंने थोड़ी बहुत मराठी भी सीखी है। मेरी कोशिश रही है कि मैं परदे पर मान्या सुर्वे ही लगूं।
आपके बैनर की पहली फिल्म 'विकी डोनर' की तो धूम मच गई। अब आप एक मजबूत प्रोड्यूसर बन चुके हैं?
`विकी डोनर’ की सफलता से मैं बहुत खुश हूं। इतनी बड़ी सफलता के बारे में किसी ने भी नहीं सोचा था। बस यह जरूर लगता था कि एक अलग सी ईमानदार फिल्म बना रहे हैं।
अपने प्रोडक्शन की अगली फिल्म 'मद्रास कैफे’ के बारे में बताइए?
यह एक एक्शन फिल्म है, लेकिन इसमें पॉलिटिकल इश्यू भी उठाए गए हैं। इसकी स्क्रिप्ट भी `विकी डोनर’ की तरह ही कमाल की है। इसका निर्देशन भी सुजीत सरकार ही कर रहे हैं। वे बहुत ही प्रतिभाशाली निर्देशक हैं।
क्या किसी फिल्म का निर्देशन भी तय कर लिया है?
प्रोड्यूसर बनने के बाद अब अगला कदम निर्देशन ही है। मैं कई स्क्रिप्ट पढ़ रहा हूं, देखते हैं कि कब इस क्षेत्र में कदम रख पाता हूं।
आप एक्सपेरिमेंटल किरदार निभाने के लिए क्यों लालायित दिखते हैं?
एक अदाकार को अपनी भूमिकाओं के साथ प्रयोग तो करना ही चाहिए। 'नो स्मोकिंग' या 'आशाएं' जैसी फिल्मों में इसीलिए काम किया कि वे रुटीन से अलग थीं।