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तो दिलीप कुमार का कैरियर ही पैकअप हो जाता

Sat, 30 Nov 2013 01:27 PM IST
रामकृष्ण
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दिलीप कुमार भले ही सुपरस्टार हो गए हों। लेकिन एक घटना उन्हें अर्श से फर्श पर ला सकती थी।
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फिल्मों में फ्रीलांसिंग की शुरुआत पृथ्वीराज कपूर ने की थी। पहले हर फिल्म निर्माण कंपनी में उसके नियमित वेतनभोगी कर्मचारी होते थे। जरूरत न हो तब भी स्टूडियो में उनकी हाजिरी अनिवार्य थी।  पृथ्वीराज कपूर ने जिस पद्धति को जन्म दिया उसके तहत कलाकार प्रमुख हो गए थे और फिल्मकार गौण।

हर कलाकार ने अपनी मर्जी  के हिसाब से फिल्में साइन करना शुरू कर दिया, जिससे उनकी गुणवत्ता का तो ह्रास होता ही, फिल्म की निर्माण-अवधि भी बढ़ जाती। जो फिल्म पहले कुछ महीनों में बन जाती थी, उसे बनाने में महीनों-बरसों लगने लगे।
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दक्षिण भारत के जिन फिल्म-निर्माताओं ने इन तौर-तरीकों को मानने से पूरी तरह इंकार कर दिया था, उनमें एशिया के सबसे बड़े स्टूडियो के स्वामी-संचालक बी. नागी रेड्डी प्रमुख थे। हिंदी में बनी उनकी पहली बिग-बजट फिल्म `राम और श््याम’ तीन महीनों की रिकॉर्ड अवधि में बन गई थी।

मुख्य कलाकार थे यूसुफ खां यानी दिलीप कुमार। इस कम समय में वह कैसे बन सकी, इसका खुलासा किया था खुद नागी रेड्डी ने उत्तर प्रदेश फिल्म पत्रकार संघ के एक प्रशस्ति समारोह में। फिल्म के लिए  दिलीप से सम्पर्क करने के लिए उन्होंने एक कर्मचारी को मुंबई रवाना किया।

पर दिलीप ने अपना पारिश्रमिक जो बताया, वह उनके प्रचलित मेहनताने से डेढ़ गुना अधिक था। तब भी उसे स्वीकार करते हुए उनसे कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत करा लिए गए।

मुंहमांगा एडवांस देते हुए शूटिंग की तारीखें भी उनको बता दी गईं और निर्देश दिया गया कि वह फलां-फलां तारीख को सुबह दस बजे स्टूडियो पहुंच जाएं, लेकिन दिलीप की आदतें तो मुंबई की थीं।

दोपहर तक तो वह सोते ही रह गए। फिर स्टूडियो के लिए निकलते-निकलते चार की गजर भी बज गई। पांच के आसपास जब वह स्टूडियो पहुंचे तो पता चला कि पैकअप हो चुका है और अब उनकी जरूरत नहीं।
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मिलने पर नागी रेड्डी ने उनसे कहा था, `शिड्यूल के अनुसार रिपोर्ट करने में अगर आप समर्थ नहीं हैं, तो हमें अपना कॉन्ट्रैक्ट रद्द करना पड़ेगा। जो रकम अग्रिम रूप से आपको दी जा चुकी है उसे वापस करने की कतई कोई जरूरत नहीं, लेकिन भविष्य के लिए अपनी आदतों में अगर आप अपेक्षित सुधार कर सकें, तो वह खुद आपके अपने हित में होगा।

दूसरे दिन से स्टूडियो पहुंचने में दिलीप को एक मिनट का भी विलम्ब नहीं हुआ और फिल्म अपनी निर्धारित अवधि में पूरी हो गई।
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