अधिकांश निजी स्कूल व कॉलेजों की कैंटीन में बच्चों को खाने के नाम पर कोर्ट व सरकार के प्रतिबंध के बाद भी धड़ल्ले से जंक फूड की बिक्री हो रही है। इस ओर न तो जिला खाद्य अधिकारी का ध्यान है और न ही सरकार का। नतीजा स्वाद के नाम पर बच्चे व युवा रोगों को बुलावा दे रहे हैं।
वर्षों पहले सेंटर फॉर साइंस एंड इंवायरमेंट (सीएसई) की रिपोर्ट के मुताबिक कैंटीन और बाजार में बिक रहे जंक फूड को स्वास्थ्य के लिए घातक बताया गया था।
इतना ही नहीं कोर्ट ने भी स्कूल-कॉलेजों में जंक फूड बेचने पर प्रतिबंध लगाया था। लेकिन स्वास्थ्य के साथ लगातार खिलवाड़ किया जा रहा है। नतीजा बच्चे मोटापे, कमजोरी, कोलेस्ट्राल बढ़ने की समस्या से जूझ रहे हैं। अधिकांश स्कूल प्रबंधन कैंटीन में जंक फूड बेचने की बात को नकार रहे हैं। उनके मुताबिक कैंटीन नहीं बंद कर सकते मगर जंक फूड न बेचा जाए, इस पर नजर रखते हैं।
स्कूल कैंटीन में प्रतिबंध के बाद भी जंक फूड पर रोक नहीं लग पा रहा है। अंत में परेशान होकर कैंटीन ही बंद करना पड़ा। खाने का कोई विकल्प नहीं होने से बच्चों को घर से खाना लाना मजबूरी है। इसके अलावा 85 फीसदी स्कूलों में मॉनिटरिंग टीम का गठन किया गया है जो कैंटीन के खानों पर नजर रखती है।
-ज्योति दहिया, प्रिंसिपल डीएवी स्कूल
10 वर्ष में बढ़ा फास्ट फूड का चलन
एनसीआर में बसने के लिए परिवार में माता-पिता कामकाजी हैं। स्टेटस मेंटेन करने और समय में काम निपटाने के लिए शहर में जंक फूड का चलन तेजी से बढ़ा है। कामकाजी परिवार के कारण ज्यादातर लोग सुबह के खाने में जंक फूड का ही इस्तेमाल करते हैं। बाजार के विशेषज्ञों की मानें तो जंक फूड का चलन दिल्ली-एनसीआर में 10 वर्षो में बढ़ा है। इसकी शुरुआत कैंटीन से ही हुई है। शहर के बाजारों में भी चिप्स, बर्गर, कोल्ड ड्रिक्स, पोटैटो फ्राई, भुजिया जैसे जंक फूड की खूब खपत है।
‘रेडी टु ईट फूड’ दे रहे ये बीमारियां
ब्लड प्रेशर का बढ़ना, कोलेस्ट्रॉल लेवल का बढ़ना, हार्ट अटैक के चांस, मेटाबोलिक रेट का गिरना (पाचन शक्ति गिरनी), इम्यून सिस्टम का कमजोर पड़ना, टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ना, कोलोन कैंसर, थोड़े-थोड़े समय के बाद बुखार आना, शरीर में कमजोरी, वजन बढ़ना, लीवर डैमेज, आर्टिरीज में ब्लॉकेज, नींद ना आना या बार-बार नींद खुलना, ऑर्थराइटिस आदि।
15-20 फीसदी बच्चों में समस्या
जिन बच्चों की मेन डाइट ही जंक फूड है, उनमें काफी मात्रा में कार्बोहाइट्रेट जा रहा है। नतीजा ओबेसिटी, ओवरवेट के शिकार हो रहे हैं। ऐसे 15 से 20 फीसदी बच्चे हैं। इनकी शरीर को न्यूट्रीशन नहीं मिल रहा। विटामिन, प्रोटीन की कमी के कारण कुछ ही समय में बच्चों की सेहत बिगड़ने लग रही है।