हाथ कलम थामना चाहते थे लेकिन नन्हें हाथों को भारी-भरकम काम दे दिया गया। पीठ पर बस्ता होना चाहिए था लेकिन उसे मजदूरी का बोझ ढोना पड़ा। होंठ बचपन की अठखेलियों के बीच मुस्कुराना चाहते थे लेकिन चार साल तक उनसे दर्द भरी आह निकलती रही। बंद कैदखाने में उसके सपने चकनाचूर होकर आंखों से आंसुओं की शक्ल में बहते रहे। गम और अफसोस में पल-पल गुजरता वक्त उसे नाउम्मीदी के स्याह अंधेरे की ओर ले जा रहा था, लेकिन शायद एक आखिरी उम्मीद बची रह गई थी।
और बड़ी बहन को उस कैदखाने के बाहर खड़ा पाया तो उससे लिपटकर वो ऐसी रोई कि एक सांस में साथ में हुए जुल्मों-सितम की पूरी दास्तान बयां कर दी।
हमारा कानून बालश्रम के खिलाफ कड़ी सजा देता है। अब उस ठेकेदार की सजा क्या होगी जिसने एक किशोरी से चार साल तक जबरन मजदूरी कराई और उसका शोषण किया?
यूपी की औद्योगिक नगरी कानपुर का ये मामला कुछ ऐसे ही सवाल खड़े करता है। आरोप है कि 13 वर्षीय किशोरी को एक ठेकेदार के यहां चार साल तक प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा।